जिला अस्पताल में बंद पड़ा इंसेफेलाइटिस वार्ड।
- फोटो : अमर उजाला
सिद्धार्थनगर। पूर्वांचल में महामारी का रूप ले चुके इंसेफेलाइटिस के कहर से बुद्ध भूमि भी अछूती नहीं है। हर साल यहां दर्जनों जिंदगियां इंसेफेलाइटिस के कहर से खत्म हो जाती हैं। जेई-एईएस का असर लगातार बढ़ रहा है। बावजूद जिले में इससे निपटने के संसाधन उपलब्ध नहीं हो पाए हैं। मरीजों को सीधे गोरखपुर या लखनऊ रेफर कर दिया जाता है। समय से उपचार के अभाव में पीड़ित अक्सर जिंदगियां गंवा देते हैं। इंसेफेलाटिस के कहर को थामने के लिए शासन-प्रशासन स्तर पर कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया जा रहा और न ही जनप्रतिनिधि ही ठोस पहल कर रहे हैं।
ऐसे में चिह्नित गांवों के लोग हर साल छह माह तक इंसेफेलाइटिस के खौफ के साए में जीवन बिताने को मजबूर हैं।
नेपाल सीमा से सटे होने के कारण इस क्षेत्र में इंसेफेलाटिस प्रभावी है। जितना भयावह यहां जेई है उससे कहीं अधिक प्रकोप एईएस का है। बावजूद यहां का स्वास्थ्य ढांचा इस अनुरूप नहीं कि इंसेफेलाइटिस का स्थानीय स्तर पर बेहतर उपचार हो सके। जिला चिकित्सालय में ही विशेषज्ञ चिकित्सकों की भारी कमी है। ग्रामीण क्षेत्रों के सीएचसी-पीएचसी का हाल तो और बुरा है। नतीजा इंसेफेलाइटिस के आगे लोग बेबस हैं। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2013 में जेई के 19 मामले सामने आए थे, इनमें 7 की मौत हो गई।
एईएस के 127 मामलों में 22 ने जान गंवाई। इसी तरह वर्ष 2014 में जेई के 21 मामलों में 7 और एईएस के 180 केस में 32 की मौत हुई। वर्ष 2015 में जेई के कुल 24 मामले जिले में दर्ज हुए, जिसमें आठ की मौत हो गई। एईएस के 160 केस सामने आए। इसमें 30 ने जान गंवाई। सबसे भयावह स्थिति वर्ष 2016 की है। इस वर्ष जेई-एईएस के 247 मरीज प्रकाश में आए हैं। इसमें 53 को बचाया नहीं जा सका। ज्यादातर मामलों में पीड़ितों ने मेडिकल कॉलेज पहुंचकर जान गंवाई। जाहिर सी बात है कि अगर जिले में ही उन्हें समय पर और नियमित उपचार मिलता तो उनकी जिंदगी को भी बचाया जा सकता था।