गनवरिया स्तूप के बगल में मिला कुआं अब तक नहीं हुआ संरक्षित
सलारगढ़ में लगी बाउंड्री के बाहर की जमीन पर दिखता है पुराना अवशेष
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। जिले के कपिलवस्तु परिक्षेत्र में पुरातात्विक धरोहर मिलते रहते हैं, ऐसे में कुछ धरोहरों को संरक्षित किया गया है। लेकिन संरक्षित की गई धरोहरों के आस-पास अभी भी प्राचीन स्तूप, टीले व कुएं मिल रहे हैं। इन पुरातात्विक धरोहरों को प्रशासन संरक्षित नहीं कर रहा है। इससे इनका क्षरण हो रहा है।
यदि कपिलवस्तु परिक्षेत्र में प्राचीन अवशेषों को संरक्षित किया जाए तो यहां भी नेपाल के लुंबिनी की तर्ज पर विकास की राह आसान हो सकती है। इतिहासकारों के अनुसार, कपिलवस्तु स्तूप उन आठ मौलिक स्तूपों में से एक है, जो गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अवशेषों पर बनाए गए थे। इसके आसपास भी कई पुरातात्विक धरोहर हैं।
पीएमओ से आए एक मेल के बाद दो साल पहले जिले के गांवों में पुरातात्विक सर्वे का आदेश हुआ था। उसके बाद कुछ जगहों को संरक्षित भी किया गया था। लेकिन अभी भी आस-पास की जगहों पर अवशेष मिलते रहते हैं। ऐसे में इतिहासकारों के अनुसार सर्वे कराकर खनन होने से पुराने टीले व स्तूप को संरक्षित किया जा सकता हैं। इससे जिले में पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।
सर्वे कराकर किया जाए उत्खनन
इतिहासकारों के अनुसार कपिलवस्तु के परिक्षेत्र का पूरी तरह से प्रशासन को सर्वे करवाना चाहिए। उसके बाद सर्वे में मिले पुरातात्विक धरोहरों वाले स्थान का उत्खनन करवाया जाए। इससे उन जगहों को संरक्षित किया जा सकता है। अभी भी कई संरक्षित टीलों के आस-पास धरोहर मिल रहे हैं। लेकिन उनका संरक्षण नहीं किया जा रहा हैं। इससे बारिश के समय में उनका क्षरण होता है। ऐसे में उन स्थानों को सर्वे करवाकर संरक्षण करने से इन धरोहरों को संरक्षित किया जा सकता हैं।
गनवरिया स्तूप से 50 मीटर दूर मिला कुआं, संरक्षण के अभाव में हो रहा क्षरण
नवंबर माह में क्षेत्र के एक किसान ने कुआं देखा। उसकी सूचना उसने इतिहासकारों को दी। उसके बाद से इतिहासकारों ने कुएं का सर्वे किया। बताया कि वह कुआं लगभग दो हजार वर्ष पुराना हो सकता है। जबकि उससे पचास मीटर की दूरी पर तीन कुओं का सर्वेक्षण किया गया है। ऐसे में कुएं का सर्वेक्षण नहीं होने से उसका क्षरण होगा। इतिहासकारों की माने तो अवशेष को संरक्षित करने के जिले में भी लुंबिनी के जैसा विकास किया जा सकता हैं। इससे जिले का भी विकास संभव है।
-डॉ. शरदेंदु त्रिपाठी, असिस्टेंट प्रोफेसर पुरातात्विक विभाग
संरक्षित होते टीले तो जिले में आते विदेशी पर्यटक
टीलों का संरक्षण नहीं होने से जिले में विदेशी पर्यटक नहीं आते हैं। यदि कुछ विदेशी पर्यटक आते भी हैं तो वे कपिलवस्तु स्तूप को ही देखकर चले जाते है। जबकि जिले में कई जगहों पर पुरातन स्तूप मौजूद हैं। ऐसे में इन जगहों की विदेशी पर्यटकों को जानकारी हो तो जिले में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। कुछ जगहों पर सर्वेक्षण होने के बाद भी उसके आस-पास धरोहर मिलते रहते हैं। उनका भी सर्वेक्षण नहीं किया जा रहा है।
स्तूपों व टीलों को संरक्षित करने के लिए सर्वेक्षण कराने को पत्राचार किया जा रहा है। जल्द ही जिले में स्थित स्तूपों का उत्खनन करवाया जाएगा। उसके बाद उसको संरक्षित किया जाएगा।
- डॉ. ललित मिश्रा, एसडीएम सदर