सिद्धार्थनगर। फरवरी में ही दिन में गर्मी का अहसास हो रहा है। इसका असर
लोगाें के साथ ही धरातल पर भी दिख रहा है। हाल यह है कि तालाब सूख चुके
हैं। नहरों में पानी नहीं है। कुएं और हैंडपंपों का जलस्तर गिर रहा है।
ऐसे में आगामी महीनों में पानी का संकट गहराने के आसार हैं। विभागीय अफसर भी इस खतरे से इंकार नहीं कर रहे हैं।
नेपाल
सीमा और हिमालय की तराई में स्थित सीमावर्ती जिले में मई-जून में भी नदी
और तालाबों में इतना पानी रहता है कि पशु-पक्षी अपनी प्यास बुझा सकें।
यही
पानी भूगर्भ के जलस्तर को बनाए रखने में भी उपयोगी होता है। मगर, इस बार
हालात बदले हुए हैं। न तो नहरों में पानी है और न ही तालाबों में। नदियां
सिमट गईं हैं।दूसरी तरफ पानी की जरूरत पूरी करने के लिए ट्यूबवेल, पंप जैसे
साधनों से भूजल का दोहन लगातार बढ़ता जा रहा है।
इन सबका सीधा असर
सामान्य भूजल स्तर पर पड़ा है। लोगों में चिंता इस बात की है कि अभी तो
फाल्गुन की शुरुआत हुई है। इस वक्त यह हाल है तो चैत्र, बैसाख और जेठ में
क्या होगा। अलीगढ़वा निवासी शंभू प्रसाद ने बताया कि इस क्षेत्र में आस-पास
के सागरों के कारण भूजल स्तर यहां ऊपर है।
कम गहराई वाली बोरिंग
थी, मगर एक सप्ताह से हैंडपंप से पानी निकलना बंद हो चुका है। यहीं के तीरथ
कसौधन भी इस समस्या से पीड़ित हैं। प्यास बुझाने के लिए पड़ोसियों की मदद
लेनी पड़ रही है।
चिंता यह है कि अभी से पानी के संकट का यह हाल है
तो गर्मी कैसे कटेगी।लोटन ब्लाक के खीरीडीहा गांव में भी हैंडपंपों ने पानी
छोड़ने की समस्या जोरों पर है। पेयजल का संकट सबसे ज्यादा उन क्षेत्रों
में है, जो नेपाल सीमा से सटे हुए
हैं। इसमें बर्डपुर, लोटन, शोहरतगढ़, बढ़नी ब्लाक शामिल हैं।
वहीं जलनिगम के अधिशासी अभियंता प्रेमशंकर सिंह ने बताया कि औसत से भी कम
वर्षा के कारण भूजल रिचार्ज नहीं हुआ है।कम वर्षा के कारण जिले की नहरों,
नदियों में नेपाल से भी पानी नहीं आया। इस कारण भूजल रिचार्ज का क्रम बिगड़
गया है। हिमालय की तराई में होने के कारण कुछ गनीमत है, अन्य जिलों में तो
स्थिति और भी खराब है। पेयजल के आने वाले संकट को देखते हुए ही बंद पड़ी
जल परियोजनाओं को शुरू कराने का प्रयास किया जा रहा है। ओवरहेड टैंक का
निर्माण भी कराया जा रहा है, ताकि गर्मी में पेयजल संकट से राहत मिल सके।
वैसे लोगों को अपने स्तर से भी पानी बचाने का प्रयास करना चाहिए।
क्रिकेट
का मैदान बने तालाबः जिले में कई ऐसे बड़े जलस्रोत हैं, जिन्हें लोग
‘सागर’ की संज्ञा देते हैं। मगर सूखे के प्रभाव से ये भी सिकुड़ चुके
हैं।वहीं तालाबों में धूल उड़ रही है।बच्चे इनमें खेल रहे हैं।कपिलवस्तु
क्षेत्र के मझौली सागर,सिसवा सागर, बजहा ताल इसकी नजीर हैं।
करीब सौ
एकड़ क्षेत्रफल वाले मझौली और सिसवा सागर में पानी सिर्फ मध्य वाले दो-तीन
एकड़ भाग में ही बचा है। बजहा ताल में तो पूरी तरह धूल उड़ रही है। तालाब
के मध्य में रोजाना सुबह-शाम बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं। जिले में ऐसे बड़े
तालाबों की संख्या 10 से अधिक है। सबकी स्थिति कमोवेश एक जैसी ही है।