सिद्धार्थनगर। गौतम बुद्ध का जन्म वैशाख पूर्णिमा के दिन लगभग 563 ईसा पूर्व में हुआ था। आज बैशाख पूर्णिमा है और ऐसी मान्यता है कि इसी दिन बुद्ध का जन्म हुआ, उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और उनका महा परिनिर्वाण हुआ। लेकिन, उसके बाद भी कपिलवस्तु का अपेक्षा के अनुसार विकास नहीं किया गया है। जबकि बुद्ध से जुड़े अन्य क्षेत्रों को विकसित करते हुए रेल, वायु व राज्य मार्ग से भी जोड़ा गया है।
वर्तमान समय में जहां बुद्ध का जन्म हुआ लुंबनी, जहां उनको ज्ञान की प्राप्ति हुई बौद्ध गया, जहां उन्होंने अपना पहला उपदेश दिया सारनाथ, जहां उन्होंने महत्वपूर्ण समय बिताया राजगृह, वैशाली, जहां उन्होंने सर्वाधिक वर्षा बाद किया श्रावस्ती और जहां उनका महा परिनिर्वाण हुआ इन सभी स्थलों को अंतरराष्ट्रीय बौद्ध तीर्थ स्थलों को विकसित किया गया। यहां पर बुनियदि सुविधाएं बढ़ी हैं। इन्हें वायु, सड़क व रेल मार्ग से जोड़ा गया और दुनिया के बौद्ध राष्ट्रों ने अपने मंदिर बनाए।
जबकि सिद्धार्थनगर का कपिलवस्तु जो कि सीधे राजकुमार सिद्धार्थ के प्रारंभिक जीवन से जुड़ा था, जहां उनके निजी आवास थे। जहां उनका विवाह हुआ, उनका पुत्र हुआ और उनके परिनिर्वाण के पश्चात आठ मौलिक स्तूपों में से एक स्तूप उनके धातु अवशेषों पर बनाया गया।
वह कपिलवस्तु का पिपरहवा आजादी के 77 वर्ष के पश्चात उपेक्षा का दंश झेल रहा है। यहां न तो समीप से कोई राज्य मार्ग गुजरता है न ही यहां कोई हवाई अड्डा है और न ही कोई रेल मार्ग है जहां से बुद्ध के धातु अवशेष मिले कम से कम वहां तो जैसे बाकी तीर्थ स्थलों पर आधार भूत संरचनाएं विकसित हुईं दुनिया के बौद्ध राष्ट्रों के बौद्ध मंदिर बनवाए गए। उस अनुसार यहां पर भी यह सुविधा होनी चाहिए थी, लेकिन अभी तक इसके प्रति किसी का भी ध्यान आकर्षित हुई।
प्राचीन इतिहासकारों के अनुसार सिद्धार्थ की माता महामाया देवी देवदह कोलिय गणराज्य की राजधानी की कन्या थी। भारत की प्रथा के अनुसार प्रथम पुत्र का जन्म होने के लिए महिलाएं मायका जाती है, इस क्रम में महामाया भी अपने मायके जाने लगी। रास्ते में पड़ने वाली लुंबिनी जंगल में 563 ईसा पूर्व में सिद्धार्थ का जन्म हुआ। लेकिन उसके कुछ समय बाद ही उनकी माता महामाया का निधन हो गया। उसके बाद महा प्रजाति गौतमी ने सिद्धार्थ को पाला जो उनकी मौसी थी।
राजकुमार सिद्धार्थ अधिक समय तक अपने ननिहाल देवदह ही रहे। थोड़ा बड़े होने पर अपने राजधानी कपिलवस्तु आए। जहां उन्हें विभिन्न प्रकार की राजकीय शिक्षा दी गई तथा उनकी शादी यशोधरा के साथ लगभग 16 वर्ष की उम्र में हुई। यशोधरा भी कोलिय राज वंश की कन्या थी।
इन दोनों का पुत्र राहुल हुआ जैसा कि बौद्ध साहित्य से विदित होता है कि सांसारिक जीवन और अन्य अनेक कारणों से दुखित होकर वास्तविक ज्ञान की तलाश के लिए लगभग 29 वर्ष की आयु में कपिलवस्तु से गृह त्याग कर दिया। महात्मा बुद्ध विभिन्न मत के आचार्य और स्थानों का भ्रमण करते आखिर में 35 वर्ष की आयु में बोध गया में उन्हें वैशाख पूर्णिमा के दिन ज्ञान की प्राप्ति हुई।
प्राचीन इतिहासकार डॉ. शरदेंदु कुमार त्रिपाठी ने बताया कि बुद्ध वर्षा के महीनों को छोड़ कर अन्य महीनों में घूमते रहते। गौतम बुद्ध उत्तर भारत के जिन प्रमुख नगरों में अपने मत का प्रचार-प्रसार किया, उनमें श्रावस्ती, सारनाथ, काशी, राजगृह, वैशाली, कौशांबी आदि प्रमुख थे। गौतम बुद्ध 80 वर्ष की आयु में तत्कालीन मलय गणराज्य की राजधानी कुशीनारा (वर्तमान कुशीनगर) में लगभग 483 ईशा पूर्व में मृत्यु को प्राप्त हुए। संवाद