संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में मरीज माफिया की गठजोड़ को तोड़ने के लिए भले ही जिम्मेदार कार्रवाई का दम भर रहे हों, लेकिन वह मरीजों का शोषण बंद नहीं कर रहे हैं। प्रशासन की सख्ती के बीच वह मरीजों की खरीद फरोख्त, उन्हें बरगलाकर निजी अस्पतालों पर लेकर जाने के साथ-साथ दवा से लेकर जांच तक में आर्थिक चोट पहुंचा रहे हैं। माफिया ने अब काम करने का तरीका ही बदल दिया है।
कारण मेडिकल कॉलेज तीन पार्ट में हो गया है। ऐसे में तीनों जगह उनके लोग भटकते रहते हैं और मरीजों को फंसाकर जांच से लेकर निजी अस्पताल पहुंचा रहे हैं। फिलहाल मौजूदा समय में मरीजों को जांच और दवा के नाम पर कुछ अधिक शिकार बना रहे हैं।
अस्पताल गेट से बाहर से पूरा सिस्टम काम करता है, जिससे अगर धरपकड़ की बात आए तो वह चंगुल से निकल जाएं। क्योंकि मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य निरीक्षक में कई बार अपने कर्मचारियों को ड्रेस में रहने की हिदायत दे चुके हैं। साथ ही एसपी को पत्र भेजकर अस्पताल में दलाल और निजी एंबुलेंस वालों पर कार्रवाई के लिए कह चुके हैं।
सख्ती बढ़ती है तो बाहर से ऑपरेट होता है सिस्टम : माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में मरीज माफिया की आपसी गठजोड़ तगड़ी है। किसी की मौत या दलालों पर किसी की ओर से आरोप लगाया जाता है और सख्ती बढ़ती तो काम करने का तरीका बदल देते हैं।
जांच और पुलिस की कार्रवाई के डर से सिस्टम बाहर से ऑपरेट होने लगता है, लेकिन पैठ इतनी तगड़ी है कि उनका धंधा कभी मंदा नहीं होता है। क्योंकि सबने काम बांट रखा है। कोई किसी के काम में दखल नहीं देता है। विभाग के कर्मी के मुताबिक अंदर तक पैठकर बनाकर वह मरीजों को फंसाते हैं। फिर अपने हिसाब से जांच और दवा सबकुछ लिखवाते हैं और मोटी कमाई करते हैं।
दवा की दलाली करने वाला केवल दवा का काम करता है। ब्लड की जांच कराने वाला वही काम करेगा। जबकि एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड के लिए बरगलाकर निजी केंद्र पर भेजने वाला अपना काम करेगा। वहीं, खून में कमीशन लेने वाला अगल है। हिस्से में ईमानदारी इस प्रकार से है कि जिसका जितना कमीशन होता है तय समय पर केस और पर्चे के हिसाब से पहुंचा देते हैं। इसलिए विभागीय लोग खामोश रहे हैं।
एंबुलेंस माफिया मरीजों के परिजनोंं को करते हैं गुमराह : मेडिकल कॉलेज में एंबुलेंस माफियों की इतनी तगड़ी पकड़ है कि आप समझ नहीं पाएंगे। सख्ती बढ़ती है तो एंबुलेंस को गेट के बाहर कर देंगे। और धरपकड़ शांत होते हुए इमरजेंसी वार्ड के बगल में खड़ी करते हैं।
फिर क्या शुरु होता है मरीजों के फंसाने का काम। हादसे के शिकार, हार्ट अटैक या फिर अन्य गंभीर समस्या से ग्रसित मरीज के पहुंचते ही। एंबुलेंंस माफिया के साथ रहने वाला उसका गुर्गा तपाक से मदद के लिए आगे बढ़ जाता है। ठेला खींचते हुए अंदर ले जाते हैं। तब तक मरीज के बारे में सारी जानकारी जुटा लेता है। इसके बाद वहीं, पर मंडराने लगता है।
उसी मरीज से क्या हाल है, ठीक हो रहा है कि नहीं। फिर मूड भांपते हुए बोलता है अरे यहां कुछ व्यवस्था नहीं है। विशेषज्ञ डॉक्टर भी नहीं है। इलाज क्या करें। फिर सामने वाला खुद पूछने लगता है कि कहां अच्छा इलाज हो जाएगा। फिर क्या सेटिंग वाले अस्पताल को नाम बताए और पहुंचाने की बात हो गई। मरीज रेफर की बात करने लगा है। ऐसे में कई बार डॉक्टर भी कुछ नहीं कर पाते और देखते ही देखते ही आंखों के सामने से मरीज बिक जाता है।