फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Siddharthnagar News: कई निजी अस्पतालों में भी असली-नकली दवा का खेल

Wed, 23 Oct 2024 02:09 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
विज्ञापन
मेडिकल कालेज में ​स्थित मे स्टोससे दवा लेते मरीज।
विज्ञापन
सिद्धार्थनगर। वैसे डॉक्टर और मरीज के बीच विश्वास का संबंध माना जाता है, लेकिन इस विश्वास की आड़ में असली-नकली दवा का खुला खेल चल रहा है। शहर कस्बों के मेडिकल स्टोर से लेकर कुछ निजी अस्पतालों में भी ब्रांड दवा के भाव जेनेरिक दवाओं को बेचा जा रहा है। सबसे ज्यादा ठगी भर्ती होकर इलाज कराने वाले मरीजों के साथ हो रही है।
विज्ञापन

नर्सिंग होम में भर्ती मरीजों को डॉक्टर की पर्ची पर दवा दी जाती है और फाइल में रिकॉर्ड भी रखा जाता है। इसमें 20-25 रुपये की दवा काे 80 से 100 रुपये में बेचकर कंप्यूटराइज्ड पर्ची भी दी जाती है, जो मरीज की फाइल में लगा दी जाती है। मरीज डॉक्टर पर भरोसा करते हैं और दवा की गुणवत्ता का ध्यान नहीं देते हैं। जब मरीज को अस्पताल से छुट्टी दी जाती है, तो दवाइयों का बिल नहीं दिया जाता है। उसे डिस्चार्ज स्लीप दे दी जाती है। जबकि उन्हें दवा का बिल दिया जाना चाहिए। एक डॉक्टर ने कहा कि जो डॉक्टर नहीं हैं, वे लोग भी चिकित्सा पेशा में निवेश करके डॉक्टरों को बुलाकर ऑपरेशन और इलाज का कार्य कर रहे हैं। ऐसे लोगों के अस्पताल में मानकों का अभाव है और कम गुणवत्ता वाली दवाइयों को बेचकर अधिक मुनाफा कमाने की कोशिश की जा रही है।
अमर उजाला में प्रकाशित खबरों के माध्यम से ब्रांड और जेनेरिक दवाइयों का खेल स्पष्ट हुआ है तो लोग इस प्रकार की ठगी की चर्चा करने लगे हैं। अब ब्रांडेड कंपनियों ने जेनेरिक दवाइयां भी बेचनी शुरू कर दी है। ब्रांड कंपनी का नाम देखते ही पढ़े लिखे मरीज भी संतुष्ट हो जा रहे हैं, जबकि उन्हें ब्रांड दवा के भाव जेनेरिक दवाइयां मिल रही हैं। इससे मरीज की सेहत ठीक होने में अधिक समय लग रहा है।
विज्ञापन


महत्वपूर्ण बाॅक्स
मोबाइल एप से जानें दवा की कीमत
ड्रग इंस्पेक्टर नवीन कुमार ने बताया कि मोबाइल एप फार्मा सही दाम पर दवा का नाम डालने पर सही कीमत प्राप्त हो जाती है। यदि मरीज ने दवा का बिल लिया है और एप के अनुसार कीमत नहीं है तो शिकायत करने पर जांच की जाती है। शिकायत को डीपीसीओ को भेजा जाता है। दवा खरीदने वाला व्यक्ति सीधे भी डीपीसीओ में ऑनलाइन शिकायत कर सकता है।

आईएमए और मेडिकल स्टोर एसोसिएशन भी तैयार
मरीज को इलाज कराने से पहले अस्पताल की साख के बारे में जानकारी करनी चाहिए। किसी के बहकावे में नहीं आना चाहिए। डॉक्टर से खुलकर बात करनी चाहिए और जो भी दवा खरीदनी चाहिए, उसका बिल भी लेना चाहिए। बिल लेने वाले को ब्रांड की जगह जेनेरिक दवा नहीं मिलेगी। आईएमए की बैठकों में भी मरीजों का हित सर्वोपरि होता है, इसमें गुणवत्ता वाली दवाइयों पर जोर दिया जा रहा है।
-डॉ. विमल कुमार द्विवेदी, सचिव आईएमए

मरीज को चाहिए कि कोई भी दवा खरीदें तो उसका बिल जरूर लें। बिल के साथ दवा की फोटो लेकर रखना चाहिए। ताकि जरूरत पर मिलान की जा सके। मेडिकल स्टोर संचालक भी दूसरी की कंपनी की दवा को अच्छी बता रहा हो तो आंख मूंदकर उसके ऊपर भरोसा न करें। संगठन की बैठक में सस्ती दवा की अधिक कीमत लेने पर विरोध हो रहा है, क्योंकि इसमें ग्राहकों का भरोसा कम हो रहा है।
-मनोज कुमार, जिला सचिव, दवा विक्रेता समिति


मरीजों का दर्द
मेरी तबीयत खराब हुई तो हड्डी के अस्पताल में ढाई माह तक इलाज कराया और 18,000 रुपये खर्च हो गए। जब दूसरे डॉक्टर के पास गए तो पला चला कि दर्द को छोड़कर अन्य दवाइयां जेनेरिक थीं और उनका अधिक दाम वसूला गया।
-उमेश सिंह, शिक्षक


मेरी की तबीयत खराब थी और उन्हें शहर के अस्पताल में भर्ती कराकर इलाज कराया। भर्ती के दौरान मेरे परिचित अस्पताल में आए तो उन्होंने दवाइयों की गुणवत्ता पर बात की, लेकिन मुझे नहीं पता था कि शिकायत पर जांच हो सकती है।
-उमेश, दुकानदार

-
अधिवक्ता की राय
किसी भी तथ्य को छिपाकर सामान बेचने पर उपभोक्ता हित के मामले में कार्रवाई होती है। दवाइयां जीवन बचाने के लिए दी जाती है। इसमें ब्रांड के बहाने जेनेरिक दवा बेचने पर छल कपट की धारा भी लगेगी।
विज्ञापन

-शेषमणि प्रजापति, अधिवक्ता
-
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें