सिद्धार्थनगर। बेहतर बिजली आपूर्ति को लेकर दावे चाहे जो भी हों, मगर जिले की बिजली व्यवस्था जिले में अब तक दुरुस्त नहीं हो पाई है। मुख्यालय का ही पूरब पड़ाव भेदभाव का शिकार है। पुराने और जर्जर तार से घनी आबादी में आपूर्ति की जा रही है तो सुदूर के तमाम गांव अब तक विद्युत रोशनी से वंचित हैं। इन गांवों में बिजली पहुंचाने के वादे अब तक पूरे नहीं हो पाए हैं। आधुनिक युग में ढिबरी की रोशनी में जी रहे ग्रामीणों और शहरी क्षेत्र के लोगों के लिए इस चुनाव में बिजली व्यवस्था बड़ा मुद्दा होगी। वर्षों से दुर्व्यवस्था झेलते उपभोक्ता इस समस्या के समाधान को लेकर अपना रुख तय करेंगे।
बिजली व्यवस्था को लेकर यह जिला हमेशा से पिछड़ेपन का शिकार रहा है। बाढ़ग़्रस्त इलाकों तक बिजली पहुंचाना चुनौती भरा रहा है। नए आधुनिक संसाधनों के बावजूद विभाग इस चुनौती से निपटने में नाकाम है। राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे को आवाज नहीं मिल पा रही। विभागीय आंकड़ों पर गौर करें तो जिले के 870 गांवों के 1069 मजरों में अब तक बिजली की रोशनी नहीं पहुंच पाई है। विद्युतीकरण से वंचित इन मजरों के लोग ढिबरी की रोशनी में दिन गुजारने को मजबूर हैं। सुदूर के इन ग्रामीण इलाकों को छोड़ दें तो शहरी क्षेत्र की तस्वीर भी बहुत बेहतर नहीं है।
जिला मुख्यालय का ही एक छोर वर्षों से इस समस्या से जूझ रहा है। रेलवे क्रॉसिंग के एक तरफ के लोगों को बदतर आपूर्ति मिल रही है तो दूसरी ओर आपूर्ति व्यवस्था अलग है। पूरब पड़ाव में एक छोटे ट्रांसफार्मर से सैकड़ों कनेक्शन बंटे हैं। दशकों पुराने तारों के जर्जर होने से आए दिन यह क्षेत्र लोकल फाल्ट से जूझता रहा है। नतीजा उन्हें अघोषित कटौती झेलनी पड़ती है। कई बार इस क्षेत्र के लोगों ने आवाज उठाई, मगर राजनीतिक नेतृत्व के अभाव में उनकी आवाज मुखर नहीं हो पाई।