सूखे से प्रभावित जिले में बजहां ताल का पानी खत्म हो चुका है। धूल उड़ रही है। तालाब खेल का मैदान हो चुका है। बावजूद वन विभाग का दावा है कि तालाब के पानी से आकर्षित होकर बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी जिले में आए हैं। तालाब के आस-पास रहने वाले ग्रामीणों ने कहा कि पानी न होने के कारण इस बार पक्षियों की संख्या कम है।
स्थानीय पक्षी भी गिने-चुने ही दिख रहे हैं। हिमालय की तराई में बसे जिले का वातावरण ठंडे क्षेत्र के पक्षियों को खूब भाता रहा है। चीन, साइबेरिया जैसे देशों से ठंड के इस मौसम में हर साल बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी यहां आते हैं। नेपाल सीमा पर स्थित मझौली सागर, बजहां ताल इनका ठिकाना रहता है।
पक्षियों की आवक नवंबर माह से ही शुरू हो जाती है और जनवरी तक वह यहीं बसते हैं। वन विभाग ने पिछले दिनों यह दावा किया था कि यहां बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी पहुंच चुके हैं। मझौली सागर के साथ बजहां ताल में सैकड़ों की झुंड में यह पक्षी नजर आ रहे हैं।
इनमें सारस, कैमा के अलावा सुरखाब, किंगफिशर जैसी दुर्लभ प्रजाति के पक्षी भी शामिल हैं। इसकी जांच की गई तो वन विभाग के दावे हवा-हवाई साबित हुए। जिस बजहां ताल के पानी से आकर्षिक होकर विभाग प्रवासी पक्षियों के बड़ी संख्या में आने के दावे कर रहा है, वहां पानी ही नहीं है।
ग्रामीणों ने कहा कि वह इस बार पक्षियों की चहचहाहट सुनने को तरस रहे हैं। गिनती के चंद परिंदे ही यहां आए हैं। उनमें भी इसी क्षेत्र के सारस ही शामिल हैं। डीएफओ जीएस सक्सेना ने बताया कि पिछले दिनों मझौली सागर गया था तो वहां सारस नजर आए थे।
लुंबिनी में सारस सेंचुरी है, इसलिए उनकी संख्या यहां बढ़ी है। बजहां ताल को मैंने अभी नहीं देखा है, लिहाजा वहां के बारे में कुछ नहीं बता सकता। पक्षियों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए पक्षी विशेषज्ञों की टीम को बुलाया गया है। वह यहां रूककर सर्वे करेंगे।