सीमा की सुरक्षा और नागरिकों की जीवन रक्षा का फर्ज निभा रहे जवान
अपनों से दूर लोगों की सेवा में जुुटे हैं एसएसबी जवान
सीमा सील होने पर चौबीस घंटे गश्त और राशन सहित जरूरी सामान मुहैया करा रहे है
ध्रुव यादव
कपिलवस्तु। हमारे लिए तो पूरा देश ही हमारी फैमिली है, सीमा पर रह रहे देश के नागरिक भी तो अपने हैं, लॉकडाउन के दौरान इनका भरण-पोषण भी हमारे लिए उतना ही जरूरी है जितना परिवार वालों का। यह जज्बात हैं भारत-नेपाल सीमा पर तैनात सीमा सुरक्षा बल के जवानों के। अंतरराष्ट्रीय सीमा सील होने और लॉकडाउन के कारण छुट्टियां टलने के कारण यह जवान परिवार से मिलने नहीं जा पा रहे हैं लेकिन भारत-नेपाल की सुरक्षा के साथ ही सीमा पर रहने वाले नागरिकों की सुरक्षा भी परिवार के सदस्यों की तरह कर रहे हैं। जनता भी उन्हें देवदूत की तरह सम्मान दे रही है।
डिप्टी कमांडेट मनोज कुमार सिंह ने बताया कि जब से लॉकडाउन हुआ है बनारस से माता-पिता का रोज फोन आता है। दोनों को उनके स्वास्थ्य की चिंता है, पिता जी रोज सावधानी बरतने की सलाह देते हैं, जबकि माता जी पूछती हैं कि खाना खाया या नहीं, तबीयत तो ठीक है। माता-पिता से बात करने के बाद नए जोश से फर्ज निभाने में जुट जाते हैं। भरतपुर राजस्थान के 43वीं वाहिनी के उप निरीक्षक भूपेंद्र सिंह के कहते हैं सीमा पर रहने वालों में उन्हें अपनी मां, भाई, बहन नजर आते हैं इनकी सेवा कर लगता है कि परिवार की सेवा कर रहे हैं। अचानक भावुक होकर कहते हैं कि ईश्वर करे घर पर सभी सुरक्षित हों, बात तो लगभग रोज ही होती है लेकिन घरवाले अपनी समस्याएं नहीं बताते कि मैं परेशान न हो जाऊं। सीमा चौकी ककरहवा कंपनी कमांडर उप निरीक्षक मुकेश चौधरी संतकबीरनगर के मेंहदावल के रहने वाले हैं। वह कहते हैं कि भले ही घर पास में है लेकिन कोरोना संकट के इस दौर में हम अपनी जिम्मेदारी छोड़ कर नहीं जा सकते। लेह-लद्दाख के रहने वाले सीमा चौकी अलीगढ़वा के सहायक कमांडेंट छेवांग दोरजे का कहना है कि कोरोना संकट से अपने देश को बचाने के लिए सीमा पर किसी प्रकार की आवाजाही न हो इसके लिए हम लोग दिन रात गश्त तो कर ही रहे हैं, सीमा क्षेत्र के नागरिकों को राशन, दवाईयां, सैनिटाइजर, मास्क और साबुन आदि पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध करा रहे हैं ताकि उन्हें घर से बाहर नहीं निकलना पड़े। छेवांग दोरजे कहते हैं कि यहां और घर पर दोनों ही जगह नेटवर्क की दिक्कत रहती है। कई दिन प्रयास करने के बाद अगर बात होती भी है तो नेटवर्क के कारण कभी वह लोग इधर की आवाज नहीं सुन पाते और कभी उनकी आवाज इधर नहीं आती।