सिद्धार्थनगर। कैमरे में कैद यह पानी के जार नहीं हैं… बल्कि सिद्धार्थनगर के सिस्टम की बड़ी लापरवाही की तस्वीर है। जहां घर-घर, दुकान-दुकान और सरकारी दफ्तरों तक 20 लीटर के जार में पानी पहुंच रहा है।
दावा शुद्धता का है, लेकिन हकीकत यह कि जिले में चल रहे 200 से ज्यादा आरओ प्लांट के पानी की वर्षों से गुणवत्ता नहीं जांची गई है। सील और कार्रवाई की बात को छोड़ दें, यहां अभी तक सैंपल तक नहीं लिया गया है। इससे धंधेबाजों का धंधा चमक रहा है और रोज हजारों लीटर पानी बेचकर हर माह लाखों रुपये कमा रहे हैं। सवाल सीधा है, जिस पानी पर लोगों की सेहत टिकी है, उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है।
शहर में नलों से आने वाले पानी की गुणवत्ता ठीक न होने के कारण लोग मजबूरी में आरओ प्लांट का सहारा ले रहे हैं। संचालक 20 से 30 रुपये में 20 लीटर पानी घर तक पहुंचा रहे हैं, जिसे लोग सस्ता और सुरक्षित समझकर खरीद रहे हैं। लेकिन यह सुरक्षा सिर्फ भ्रम है। सूत्रों की मानें तो अधिकतर आरओ प्लांट बिना लाइसेंस, लैब टेस्ट और जरूरी मानकों के बिना ही संचालित किए जा रहे रहे हैं। पानी की शुद्धता को लेकर न तो कोई प्रमाण दिया जाता है और न ही कैन सील बंद होती है।
ग्राउंड पर पड़ताल में सामने आया कि अधिकतर आरओ प्लांट में पानी बोरिंग से निकाला जा रहा है। इस पानी में फ्लोराइड, आयरन, आर्सेनिक, मैग्नीशियम जैसे तत्वों की मात्रा क्या है, इसकी जांच भी नहीं की जा रही है। इतना ही नहीं, सूक्ष्म बैक्टीरिया और वायरस की मौजूदगी से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद यही पानी ठंडा कर लोगों को परोसा जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक मानकविहीन पानी पीने से पेट, आंत, यूरिन इंफेक्शन, थायराइड और अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
अधिक दोहन से घट रहा भूगर्भ जलस्तर: शहर के विभिन्न मोहल्लों समेत जिले के कस्बों व गांवों तक में संचालित हो रहे आरओ प्लांट द्वारा भूगर्भ जल के अत्याधिक दोहन से भूगर्भ जलस्तर में गिरावट देखी जा रही है।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक भारी पैमाने पर हो रहे जल दोहन से भूगर्भ जलस्तर भी नीचे खिसक रहा है। इनमें से इक्का-दुक्का ने ही लैब में आर्सेनिक, आयरन व अन्य तत्वों की जांच जल निगम से करा रखी है जबकि अन्य बिना जांच के ही पानी परोस रहे हैं। अधिकांश ने भूगर्भ विभाग से अनुमति भी नहीं ली है।