मेडिकल कॉलेज के इमरजेंसी वार्ड में मरीज को ऑक्सीजन लगाते स्वास्थ्य कर्मी। संवाद
सिद्धार्थनगर। तापमान गिरते ही दिल के मरीजों की धड़कनें बढ़ रही हैं। पुराने मरीजों को अटैक पड़ रहा है तो वहीं, ब्लड प्रेशर के उतार-चढ़ाव का नए लोग भी शिकार हो रहे हैं। मगर इनका इलाज कराने के लिए लोगों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है।
जिला अस्पताल से मेडिकल कॉलेज का दर्जा मिलने के चार साल बाद भी जिले को एक भी नियमित हृदय रोग विशेषज्ञ नहीं मिल पाया है। नतीजा इमरजेंसी में पहुंचने वाले दिल के दर्द के मरीजों को हजारों रुपये खर्च कर गोरखपुर या लखनऊ जाना पड़ रहा है।
रोगियों के इलाज के लिए ट्राॅमा सेंटर बनाया जा चुका है, लेकिन वह भी अनुपयोगी साबित हो रहा है। ऐसे में बढ़ती ठंड ने परेशानी और बढ़ा दी है। मेडिकल कॉलेज के इमरजेंसी वार्ड में पहुंच रहे मरीजाें के आंकड़ों पर गौर करें तो 24 घंटे में 15 से 20 दिल में दर्द की शिकायत लेकर मरीज पहुंच रहे हैं। वहीं, ओपीडी में संभावित लक्षण वाले 20-25 मरीज इलाज करा रहे हैं। इनकी जांच में ब्लड प्रेशर का अधिक होना, नसों में खिंचाव सहित अन्य हिस्ट्री मिल रही है, जिसके बाद हायर सेंटर जाकर इलाज कराने की सलाह दी जा रही है।
वहीं, ईसीजी की जांच में कुछ हद तक इलाज संभव होने पर चेस्ट फिजिशियन इलाज करते हैं, लेकिन मेडिकल कॉलेज में कार्डियोलॉजी विभाग न होने के कारण सभी मरीजों को इलाज, सलाह और सुविधा के अभाव में रेफर करना पड़ रहा है।
लगभग 30 लाख की आबादी वाले जनपद के लोगों को मेडिकल कॉलेज बनने के बाद उम्मीद थी कि जिले में दिल के मरीजों को विशेषज्ञ सुविधा मिलेगी, लेकिन चार वर्ष में न विभाग बना और न ही डॉक्टर की तैनाती हो पाई। एक डॉक्टर की तैनाती जरूर हुई, लेकिन वह खुद गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं और लंबे समय से अवकाश पर हैं। जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज दोनों जगह ईसीजी के अलावा, जांच की अन्य बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। इमरजेंसी में स्टाफ न केवल जोखिम में काम करता है बल्कि बिना विशेषज्ञ के दवाइयां लिखना भी चुनौती है।