- भनवापुर ब्लॉक क्षेत्र के भुलिहया गांव में गांव स्तरीय जागरूकता कार्यक्रम आयोजित हुआ
भारतभारी। डुमरियागंज तहसील क्षेत्र के कृषि विज्ञान केंद्र सोहना ने बुधवार को भनवापुर ब्लॉक के भुलिहया गांव में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया। इस कार्यक्रम में किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के महत्व और तरीकों के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई।
परियोजना के सह अन्वेषक शेष नारायण सिंह ने बताया कि सुपर सीडर और हैप्पी सीडर से बिना पराली जलाए गेहूं की बोआई संभव है। मल्चर और स्ट्रॉ रिपर मशीनें खेत में बची पराली को छोटे टुकड़ों में काटकर मिट्टी में मिला देती हैं। बेलर मशीन से पराली के गांठ बनाकर पशु चारे या बायोगैस प्लांट के लिए बेचे जा सकते हैं, जिससे अतिरिक्त आय होती है।
कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष प्रदीप कुमार ने भी फसल अवशेष प्रबंधन पर प्रकाश डाला। मृदा वैज्ञानिक प्रवेश कुमार देहाती ने पराली जलाने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति नष्ट होने और उत्पादन लागत बढ़ने की बात कही। उन्होंने किसानों को फसल अवशेष मिट्टी में दबाने और कंबाइन हार्वेस्टर के पीछे स्ट्रॉ प्रबंधन सिस्टम उपयोग करने की सलाह दी। खेत में नमी बनाए रखने से अवशेष सड़कर मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाते हैं, जिससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है।
अन्य वैज्ञानिकों ने भी दिए सुझाव
उद्यान वैज्ञानिक प्रवीण कुमार मिश्र ने फसल अवशेषों को सब्जी की खेती में जैविक पलवार के रूप में प्रयोग करने का सुझाव दिया। इससे खरपतवार कम होते हैं, मृदा में जैविक कार्बन बढ़ता है और गुणवत्तायुक्त सब्जी उत्पादन होता है। पशुपालन वैज्ञानिक सुनील सिंह ने धान की पराली को जलाने के बजाय पशु चारे के लिए उपयोग करने को कहा। उन्होंने बताया कि पशुओं के गोबर और मूत्र का खेतों में प्रयोग रासायनिक उर्वरकों की जरूरत कम करता है। कच्ची पराली को वैज्ञानिक तरीकों से उपचारित कर उपयोग करना पशुओं के लिए बेहतर माना जाता है।