-शास्त्रों के अनुसार ऐसा करने से मिलता है पितरों को भोजन
भनवापुर। वर्तमान समय में पितृ पक्ष आरंभ हो चुका है लोग जहां अपने पितरों को पिंडदान देने के लिए गया आदि तीर्थ स्थलों जा रहे हैं, वहीं कुछ लोग हैं जो घर पर ही यह कार्य कर अपने पितरों को संतृप्त करते हैं। कुछ लोग यह शंका करते हैं कि श्राद्ध में समर्पित की गईं वस्तुएं पितरों को कैसे मिलती है? कर्मों की भिन्नता के कारण मरने के बाद गतियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं।
सिद्ध पीठ वटबासिनी गालापुर मंदिर के व्यवस्थापक डॉ. ठाकुर प्रसाद मिश्र ने बताया कि कहा जाता है कि एक बार राजा करंधम ने महायोगी महाकाल से पूछा, मनुष्यों की ओर से पितरों के लिए जो तर्पण या पिंडदान किया जाता है तो वह जल, पिंड आदि तो यहीं रह जाता है। फिर पितरों के पास वे वस्तुएं कैसे पहुंचती हैं और कैसे पितरों को तृप्ति होती है। भगवान महाकाल ने बताया कि विश्व नियंता ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि श्राद्ध की सामग्री उनके अनुरूप होकर पितरों के पास पहुंचती है। इस व्यवस्था के अधिपति हैं अग्निष्वात आदि पितरों और देवताओं की योनि ऐसी है कि वे दूर से कही हुई बातें सुन लेते हैं। दूर की पूजा ग्रहण कर लेते हैं और दूर से की गईं स्तुतियों से ही प्रसन्न हो जाते हैं।