पकड़ी बाजार। क्षेत्र बैलिहवा गांव में चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन सोमवार की रात वाचक पं. श्री पुरुषोत्तम दुबे ने समुद्र मंथन की कथा सुनाई। कथा सुन पंडाल में बैठे श्रोता मंत्रमुग्ध हो उठे।
कथावाचक ने कहा कि समुद्र मंथन की कथा में देवताओं और दानवों ने मिलकर मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाकर क्षीरसागर का मंथन किया था।
इस प्रक्रिया से 14 रत्न निकले, जिसमें सबसे पहले हलाहल विष निकला, जिसे भगवान शिव ने पीकर ‘’नीलकंठ’’ कहलाए। इसके बाद अन्य रत्न जैसे कामधेनु गाय, चंद्रमा, उच्चैसर्वा, ऐरावत हाथी, कौश्तुभमणि, रंभादिक अपसराएं, परिजातवृक्ष, लक्ष्मी, वारुणी निकले और अंत में अमृत कलश को लेकर धनवंतरि निकले और अमृत कलश को दैत्यों ने छीन लिया।
देवता चिंतित हो गए तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके देवताओं की रक्षा की और सभी देवताओं को अमृत पान कराया और राक्षसों को मूर्ख बनाया। तभी एक स्वर्भानु नामक दैत्य ने सूर्य और चंद्रमा के बीच में बैठ के अमृत पान कर लिया।