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Siddharthnagar News: कमरे बढ़े, लेकिन सिमट गए रिश्ते...कुछ आंगन में अब भी भरोसे का संसार

Fri, 15 May 2026 12:30 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
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अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस पर विशेष....
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- जिले में आज भी कई परिवारों में साथ रह रहीं तीन और चार पीढ़ियां
- पलायन, नौकरी और आधुनिक जीवनशैली के बीच संयुक्त परिवार बने सहारा और संस्कार की मिसाल

सिद्धार्थनगर। जब घरों में कमरे बढ़े तो लोग कम होते चले गए...लेकिन कुछ आंगन आज भी ऐसे हैं, जहां रिश्ते अब भी पूरे के पूरे बसते हैं। तेजी से बदलते समय में जहां परिवार अब फ्लैट और दीवारों तक सिमटते जा रहे हैं, वहीं जिले में कुछ घर आज भी उस परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं, जहां तीन और चार पीढ़ियां एक ही छत के नीचे सांस लेती हैं। नौकरी, पलायन और आधुनिक जीवनशैली के दबाव के बावजूद इन घरों में न सिर्फ साथ रहने की परंपरा कायम है बल्कि रिश्तों की वह गर्माहट भी जिंदा है, जो आज के दौर में धीरे-धीरे कम होती नजर आ रही है। ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में यह तस्वीर आज भी देखने को मिल जाती है। कहीं आंगन में बच्चों की किलकारियां हैं, तो कहीं बुजुर्गों की सीख के बीच पूरा परिवार एक साथ दिन की शुरुआत करता है।
जिले में ऐसे कई परिवार इसी परंपरा को अपने तरीके से आगे बढ़ा रहा है। घर के मुखिया बताते हैं कि परिवार में कई सदस्य होने के बावजूद उन्होंने साथ रहने का तरीका नहीं छोड़ा। वे कहते हैं, आज के समय में साथ रहना आसान नहीं है, लेकिन हमने इसे अपनी ताकत बना लिया है। सबकी जिम्मेदारियां अलग हैं, फिर भी दिल एक है। जब सब एक साथ बैठते हैं, तो लगता है यही असली खुशी है। हमारे लिए संयुक्त परिवार सिर्फ रहने का तरीका नहीं, बल्कि जीवन जीने का सहारा है।
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जोगिया ब्लॉक के सिसवा बुजुर्ग में सेवानिवृत्त शिक्षक रमाकांत शुक्ला का परिवार इसकी जीती-जागती मिसाल है। सुबह होते ही उनके घर का आंगन 19 सदस्यों की चहल-पहल से भर उठता है। शुक्ला बच्चों को पढ़ाई और जीवन के संस्कार सिखाते नजर आते हैं तो चारों बहुएं मिलकर रसोई संभालती हैं। कोई स्वास्थ्य विभाग की ड्यूटी पर निकलता है, कोई खेत की ओर जाता है तो कोई निजी कंपनी की नौकरी के लिए तैयार होता है, लेकिन खाना एक साथ बैठकर ही होता है। घर के मुखिया रमाकांत शुक्ला कहते हैं कि घर बड़ा हो या छोटा, असली ताकत साथ रहने में है। बच्चे हमारे पास रहते हैं तो संस्कार अपने आप आ जाते हैं।

वहीं, लोटन विकास खंड के खखरा खुर्द गांव में त्रिपाठी परिवार भी संयुक्त परिवार की परंपरा को जी रहा है। 15 सदस्यों वाले इस परिवार में दिनभर की भागदौड़ के बाद शाम होते ही आंगन फिर से जीवंत हो उठता है। परिवार के मुखिया, प्रधान संघ अध्यक्ष अरविंद मणि त्रिपाठी, अनिल मणि त्रिपाठी और सुनील मणि त्रिपाठी जब एक साथ बैठते हैं, तो घर एक बैठक में बदल जाता है। बच्चे खेलते हैं, बुजुर्ग मुस्कुराते हैं और चाय के साथ दिनभर की बातें साझा होती हैं। यहीं फैसले होते हैं और यहीं रिश्तों की मजबूती हर दिन नई होती है। अरविंद मणि त्रिपाठी बताते हैं, हम लोग अलग-अलग काम करते हैं, लेकिन घर एक है। यहीं बैठकर हर फैसले लेते हैं, इसलिए परिवार जुड़ा रहता है।
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ऐसा होता है माहौल
- शिक्षा विद् डॉ. नरसिंह त्रिपाठी कहते हैं कि संयुक्त परिवारों में सुबह की शुरुआत सामूहिक दिनचर्या से होती है। कई घरों में आज भी पूरा परिवार एक साथ भोजन करता है और बड़े फैसले सामूहिक सहमति से लिए जाते हैं। परिवार की महिलाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जो अलग-अलग पीढ़ियों को जोड़कर परिवार को एकसूत्र में बांधे रखती हैं। युवा पीढ़ी भी इसे अपनी ताकत मानती है। परिवार के एक सदस्य का कहना है, अकेले रहने से बेहतर है कि हम सब साथ रहें। जिम्मेदारियां बंट जाती हैं और मन भी मजबूत रहता है।

सामाजिक विकास में भूमिका महत्वपूर्ण
- बदलती जीवनशैली के कारण चुनौतियां भी कम नहीं है। नौकरी और पढ़ाई के लिए युवाओं का पलायन, निजी जीवनशैली की बढ़ती सोच और पीढ़ियों के विचारों में अंतर इस व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं। इसके बावजूद जिले के ये परिवार आपसी समझ और तालमेल से इस परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं। समाजशास्त्रियों का मानना है कि संयुक्त परिवार बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे बच्चों में सहयोग, अनुशासन और रिश्तों की समझ विकसित होती है, जबकि बुजुर्गों को सम्मान और सहारा मिलता है।
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संयुक्त परिवार के बड़े फायदे
- बच्चों को संस्कार और सुरक्षा
- बुजुर्गों को सहारा और सम्मान
- जिम्मेदारियों का बंटवारा
- आर्थिक और भावनात्मक सहयोग
- सामूहिक निर्णय की परंपरा

सामने चुनौतियां भी
- नौकरी और पलायन
- निजी जीवनशैली का बढ़ता प्रभाव
- पीढ़ियों के विचारों में अंतर
- शहरों में सीमित जगह
- बदलती सामाजिक सोच


हमारे घर में 19 लोग हैं, लेकिन कभी भीड़ नहीं लगती, परिवार लगता है। सुबह हर कोई अपने काम में लग जाता है। कोई नौकरी, कोई खेती। मैं बच्चों को पढ़ाई और संस्कार सिखाता हूं। हम कोशिश करते हैं कि दिन में कम से कम एक बार सब साथ बैठें, क्योंकि यहीं से अपनापन बना रहता है और घर जुड़ा रहता है।
- रमाकांत शुक्ला, सेवानिवृत्त शिक्षक (19 सदस्य)
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दिनभर हम लोग अपने-अपने कारोबार में रहते हैं, लेकिन शाम होते ही पूरा परिवार एक जगह जरूर बैठता है। चाय के साथ दिनभर की बातें होती हैं और यहीं घर के फैसले तय होते हैं। अलग-अलग काम होने के बावजूद हमने घर को कभी बिखरने नहीं दिया...साथ रहना ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।
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- अरविंद मणि त्रिपाठी (15 सदस्य)
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आज के समय में संयुक्त परिवार निभाना आसान नहीं है, लेकिन हमने इसे अपनी पहचान बना लिया है। घर में सबकी जिम्मेदारियां अलग हैं, फिर भी हम एक-दूसरे के साथ खड़े रहते हैं। जब पूरा परिवार एक साथ बैठता है तो लगता है यही असली सुख है। हमारे लिए साथ रहना ही सबसे बड़ा सहारा है।
- नंद किशोर चौधरी, सेवानिवृत्त शिक्षक (18 सदस्य)
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