फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जीवनदायिनी नदियां मांग रहीं जीवन

Sun, 29 Jan 2017 10:22 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
विज्ञापन
लोटन में अस्तित्व तलाशती घोघी नदी। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
सिद्धार्थनगर। अपनी जलधारा से जिले की वसुधा को अभिसिंचित करने वाली नदियों का गौरवशाली अतीत रहा है। नेपाल से निकलने वाली पांच नदियां जिले से गुजरती हैं और एक बड़े भू-भाग को जल से संतृप्त करती हैं। कभी यह नदियां जिले की समृद्धि का आधार हुआ करती थी। उसका और बिस्कोहर जल व्यापार के बड़े केंद्र थे, मगर यह नदियां अब खुद बदहाली से जूझ रही हैं।
विज्ञापन

जीवनदायिनी को जीवन देने के लिए भगीरथ की तलाश है। जिले से गुजरने वाली नदियों में राप्ती प्रमुख है। यह बलरामपुर जिले से बिथरिया गांव में दाखिल होकर डुमरियागंज और बांसी तहसील के बड़े भूभाग को सिंचाई की सुविधा मुहैया कराती है। बाढ़ से लोगों को बचाने के लिए इस नदी के समानांतर बांध बने हैं पर बांधों की खस्ता हालत हर बार तबाही की कहानी कहती हैं। जर्जर बंधे नदी के रौद्र रूप को झेल पाने में अक्षम बने हुए हैं। बांध निर्माण से नदी के वेग को बांधने का जो प्रयास जिले में पिछले चालिस वर्षों से हो रहा उसमें सफलता नहीं मिली।
डुमरियागंज का मछिया गांव राप्ती नदी के कहर का उदाहरण है। इस गांव को राप्ती नदी सात बार समेट चुकी है। बलरामपुर और तुलसीपुर में स्थापित संयंत्रों का कचरा अब सीधे नदी में गिराया जाता जिससे जल प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। सत्तर के दशक तक इस नदी का जल जहां पीने में प्रयुक्त होता था अब जानवरों के नहाने और सिंचाई तक सीमित हो गया है। बाणगंगा शोहरतगढ़ बैराज से जिले में दाखिल होती है। तटों के किनारे बसे गांवों को सुरक्षित रखने के बाणगंगा को भी बांध से रोकने की कवायद हुई है पर जर्जरता पर नदी का वेग हावी है।
विज्ञापन

बाढ़ का कहर पूरे तहसील क्षेत्र के लोगों को हर बार झेलना पड़ता है। कूरा, बूढ़ी राप्ती और घोघी का पानी तो इतना दूषित है कि जानवर तक नहीं नहाते। नदियों को सीमित करने और उनके वेग पर काबू करने के लिए हुए प्रयास अधूरे हैं, जिससे जीवनदायिनी नदियों का अस्तित्व संकट में है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें