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Siddharthnagar News: सुबह धक्का-मुक्की... शाम को सन्नाटा परेशान यात्रियों ने छोड़ा रोडवेज का साथ

Sun, 17 May 2026 02:26 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
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सिद्धार्थनगर। एक तरफ प्रशासन ईंधन बचाने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट अपनाने की अपील कर रहा है। वहीं, दूसरी तरफ बसों की कमी, अनियमित टाइमिंग और भीड़भाड़ लोगों को निजी वाहनों से दूरी बनाने नहीं दे रही। सुबह बस स्टैंडों पर धक्का-मुक्की और शाम पांच बजे बाद बस्ती और गोरखपुर रूट पर सन्नाटा, यात्रियों की परेशानी को और बढ़ा रहा है। ऐसे में जिले के लोग अब ईंधन बचाने से ज्यादा समय बचाने की मजबूरी में निजी बाइक और कार का सहारा ले रहे हैं।
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जिले के प्रमुख रूट जैसे जिला मुख्यालय से तहसील और कस्बों को जोड़ने वाले मार्ग पर बसों की संख्या पहले से ही सीमित है। परिवहन विभाग के सूत्रों के अनुसार, जरूरत के मुकाबले करीब 25-30 प्रतिशत बसें कम चल रही हैं। इसका असर सुबह और शाम के पीक आवर में साफ दिखता है, जब बस स्टैंड और प्रमुख चौराहों पर यात्रियों की लंबी कतारें लग जाती हैं।
सुबह 8 से 10 बजे और शाम 5 से 7 बजे के बीच स्थिति सबसे ज्यादा खराब रहती है। कई बार बसें तय समय से 20-30 मिनट देरी से पहुंचती हैं, जबकि कुछ रूट पर एक बस छूट जाने के बाद अगली बस का कोई निश्चित समय नहीं होता। ऐसे में नौकरीपेशा लोग, छात्र-छात्राएं और छोटे कारोबारी समय पर पहुंचने के दबाव में निजी बाइक या कार का सहारा लेने को मजबूर हैं। कई यात्रियों का कहना है कि सामान्य दिनों की तुलना में शाम को दोगुना तक किराया वसूला जाता है। नतीजा यह है कि लोग ईंधन बचाने की अपील के बावजूद समय और मजबूरी के चलते निजी वाहनों का सहारा लेने को मजबूर हैं।
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बढ़नी से जिला मुख्यालय रोजाना आने वाले प्राइवेट कर्मचारी रमेश गुप्ता बताते हैं कि बस से आना चाहें तो कभी टाइम से नहीं पहुंच पाते। दो बार सवारी बदलनी पड़ती है, इसलिए बाइक ही भरोसेमंद लगती है।
इसी तरह डुमरियागंज की छात्रा पूजा यादव कहती हैं, कॉलेज टाइम पर पहुंचना होता है, लेकिन बसें इतनी भरी होती हैं कि चढ़ना भी मुश्किल हो जाता है।
कार-पूलिंग और साझा सवारी को भी ईंधन बचाने के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन छोटे शहरों में इसकी व्यवस्था अभी तक संगठित रूप नहीं ले सकी है। न तो कोई भरोसेमंद प्लेटफॉर्म है और न ही लोगों के बीच इस व्यवस्था को लेकर पर्याप्त जागरूकता है। ऐसे में यह विकल्प अभी व्यावहारिक नहीं बन पाया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अपील से लोगों का व्यवहार नहीं बदलता जब तक सार्वजनिक परिवहन सस्ता, समयबद्ध और भरोसेमंद नहीं होगा, तब तक निजी वाहनों से दूरी बनाना मुश्किल रहेगा।
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