परिषदीय स्कूलों में पढ़ने वाले नौनिहालों की पेयजल सुविधा पर जिम्मेदारों का ध्यान नहीं है। बच्चों को शुद्ध पानी मिल भी रहा है या नहीं, यह रिकार्ड तक किसी के पास नहीं है।
जलनिगम और शिक्षा विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी मढ़ रहे हैं। इस बीच नौनिहाल हैंडपंपों से निकलते दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। दूषित पेयजल के कारण क्षेत्र में तेजी से बढ़ती बीमारियों के कारण अभिभावक बच्चों की सेहत को लेकर चिंतित हो रहे हैं।
तहसील क्षेत्र अंतर्गत डुमरियागंज ब्लॉक में प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 29400 व 8620, भनवापुर ब्लॉक में 28330 व 7150, आंशिक खुनियांव ब्लॉक में 8 हजार बच्चे तहसील क्षेत्र के प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पंजीकृत हैं।
अधिकांश विद्यालयों पर विद्यालय भवन निर्माण के समय ही इंडिया मार्का व देशी हैंडपंप तो लगा दिए गए लेकिन कौन सा नल कितनी गहराई का पानी दे रहा है, यह जानकारी न तो जलनिगम के पास और न ही शिक्षा विभाग के पास है।
यही नहीं जब विद्यालय पर हैंडपंपों में मामूली खराबी रहती है तो विद्यालय पर तैनात शिक्षक या ग्राम प्रधान उसकी मरम्मत करा देते हैं, बावजूद सरकारी विद्यालयों के अधिकांश हैंडपंप विभिन्न कारणों से बेपानी है, जो ठीक हैं, उनमें भी ज्यादातर का पानी पीने योग्य नहीं है।
इंसेफेलाइटिस प्रभावित जिले में दूषित पेयजल बड़ी समस्या है। दूषित पेयजल के कारण लगातार बीमारी फैल रही है। बता दें कि जहां पर इंडिया मार्का हैंडपंप लगे हैं, उनमें प्रति हैंडपंप पर जलनिगम ने 32 हजार रुपये की दर से पूर्व में भुगतान किया है।
अब सवाल यह उठता है कि हैंडपंपों की निगरानी करने वाला जलनिगम पानी की गुणवत्ता की जांच कब कराएगा। आखिर बच्चों या उनके अभिभावकों को यह कैसे पता चलेे कि किस हैंडपंप का पानी पीने योग्य है या नहीं।