अलीगढ़वा के ग्राम मधवानगर में घर जलने के बाद लोगो ने बांस का आशियाना बनाया।
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बेटी को धूमधाम से विदा करना हर पिता का सपना होता है। इस घड़ी के लिए ही वह खून-पसीने की कमाई का एक हिस्सा जरूर बचाता है। मगर ऐन वक्त पर सारी पूंजी जब आंखों के सामने खाक हो जाए तो फिर बेबस पिता पर क्या बीतती होगी, यह मधवानगर के अग्निपीड़ितों से बेहतर कौन जानता होगा।
एक-दो नहीं, यहां आधा दर्जन परिवार ऐसे हैं, जिनके बेटी की धूमधाम से विदाई के अरमान को आग की आपदा ने मिट्टी में मिला दिया है। ग्रामीणों और समाजसेवियों ने मदद कर कुछ बेटियों के हाथ तो पीले कर दिए, मगर अब भी कई परिवारों के सामने यह संकट बना हुआ है। आग में सबकुछ जलने के बाद खुले आसमान के नीचे जीवन गुजार रहे यह परिवार नहीं समझ पा रहे कि द्वार पर आने वाली बारात को कहां बिठाएंगे।
मधवानगर में 20 अप्रैल को चार घंटे तक चले आग के तांडव ने 45 से अधिक परिवारों को बेघर कर दिया था। आग में शिवशंकर गिरी के बेटी की शादी के लिए सजा मंडप भी जल गया। घर में विवाह के लिए रखे गए बिस्तर, कपड़ा सहित अन्य सामान भी नष्ट हो गए।
पिंटू, अकालमती, भारत, गोवर्धन यादव, अली हई के आशियाने भी आग की भेंट चढ़ गए। इनके परिवारों में भी उसी सप्ताह बेटी की शादी होनी थी। खुले आसमान के नीचे आए परिवारों के दर्द का समझते हुए रिश्तेदारों ने खुद पहल कर बारात और शादी का खर्च बांट लिया।
बेहद सादगी से विवाह की रस्में निभाई गई, मगर बेबस पिता को यह मजबूरी आज भी साल रही है। साधनहीन परिवार की बेटियों की शादी के लिए सरकार की योजनाएं इनके लिए छलावा बन कर रह गई हैं।