सिद्धार्थनगर। शादी के बाद ज्यादातर लड़कियों के मनचाहा कॅरियर बनाने का सपना टूट जाता है। वह भी तब जब उन्हें ससुराल की देहरी से निकलकर पुरुषों के वर्चस्व वाले स्थान पर रहना हो। मगर पुष्पा मिश्र ने न सिर्फ इस चुनौती को स्वीकार किया, बल्कि पुरुषों की प्रधानता वाले वकालत पेशे में अपनी पहचान बनाई। कपिया मिश्र निवासी पुष्पा 20 वर्षों से जिला न्यायालय में प्रैक्टिस कर रही हैं।
जिले के ही मधुरी निवासी पुष्पा का जब विवाह हुआ तब उन्होंने सिर्फ स्नातक की पढ़ाई की थी। शादी हुई तो लगा कि वकील बनकर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का सपना अधूरा रह जाएगा। अपनी इच्छा जाहित की तो पति विनोद मिश्र ने आगे बढ़कर साथ दिया। ससुराल में रहते हुए ही पुष्पा ने एलएलबी की पढ़ाई पूरी की और फिर अधिवक्ता के रूप में जिला न्यायालय परिसर में प्रैक्टिस के लिए उतर पड़ी। बीस वर्ष पहले जब बार में आई तो हर तरफ पुरुषों का वर्चस्व था। उनके साथ कोर्ट रूम में जज के सामने बहस करना आसान नहीं था, मगर पुष्पा ने हर चुनौती का डटकर सामना करते हुए खुद को महिला अधिवक्ता के रूप में स्थापित किया। बकौल पुष्पा, कोई भी काम महिलाओं के लिए असंभव नहीं है। हर क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों को पीछे छोड़ रही हैं। बस जरूरत है, लड़कियों को अपनी क्षमता पहचानने की। समाज की परवाह छोड़कर सपनों को पूरा करने के लिए दृढ़ संकल्पित होकर कदम बढ़ाएं, मंजिल जरूर मिलेगी।
अल्पसंख्यक कल्याण विभाग में मुख्य वक्फ निरीक्षक के रूप में कार्यरत सविता भारती मूलत: बरेली की निवासी हैं।
पिता ट्रक ड्राइवर थे और परिवार में छह बहन-दो भाई। सामने चुनौतियों का पहाड़ था, लेकिन हिम्मत हारने की बजाय डटकर उसका सामना किया। बचपन से ही सरकारी नौकरी में आने का सपना था, लेकिन परिस्थितियां अनुकूल नहीं थी। पिता ने उनका हौसला बढ़ाया। घर से दूर लखनऊ में बीएससी की पढ़ाई के लिए भेजा। वहीं तैयारी की और वर्ष 2008 में नौकरी में चयनित हुई। बरेली से अकेले सिद्धार्थनगर आकर नौकरी करना भी कम मुश्किल भरा नहीं था, मगर पिता के प्रोत्साहन और भरोसे ने हर चुनौती को आसान कर दिया। पहले सपना पूरा किया फिर शादी की। सविता बताती हैं कि सैकड़ों किमी दूर दूसरे शहर में नौकरी के दौरान काफी दिक्कतें आई, लेकिन हमें भी यहां जमना था। लिहाजा सबका डटकर सामना किया। सविता का कहना है कि समाज में अब लड़कियों के पास आगे बढने के मौके अपार हैं। बस झिझक छोड़कर कदम बढ़ाने की जरूरत है। लड़कियां किसी भी मामले में पुरुषों से कम नहीं है।