संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। अब समय से पहुंच न पाने और इलाज के अभाव में नवजात बच्चों की जिंदगी की डोर नहीं टूटेगी। क्योंकि तत्कालिक इलाज के लिए जिले के 14 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में 56 बेड का एनबीएसयू वार्ड बनाने की कवायद शुरू हो गई है।
इसमें जन्म के दौरान गंदा पानी मुंह में जाने, पीलिया, समय से पूर्व जन्म लेने वाले बीमार बच्चों को ठीक होने तक भर्ती करके इलाज किया जाएगा।
अभी तक 20 बेड की यह सुविधा माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में है। जन्म के बाद बच्चों की हालत बिगड़ने पर मेडिकल कॉलेज या निजी अस्पताल में लोग जाते हैं। कई बार समय से न पहुंच पाने की वजह से बच्चे दम तोड़ देते हैं। वहीं, कुछ की समय से इलाज न होने से समस्या और बढ़ जाती है। इसका असर लंबे समय तक बच्चों पर रहता है।
सरकार जच्चा और बच्चा दोनों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए सरकारी अस्पताल में प्रसव पर जोर देती है। महिलाओं के गर्भवती होने के बाद से ही समय-समय पर टीकाकरण और फिर अस्पताल में प्रसव करवाने के लिए निचले स्तर की स्वास्थ्य इकाई आशा वर्कर को जिम्मेदारी दी है।
नियमित जांच और प्रसव तो हो जाता है, लेकिन ब्लॉक लेबल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर न्यू बोर्न स्टेबलाइजेशन यूनिट (एनबीएसयू) की सुविधा न होने के कारण गंदा पानी मुंह में जाने, पीलिया, समय से पूर्व जन्म लेने वाले बच्चों के इलाज में परेशानी होती है।
हालत बिगड़ते ही उन्हें मेडिकल कॉलेज रेफर किया जाता है। क्योंकि मेडिकल कॉलेज में ही 20 बेड का वार्ड है, लेकिन यहां तक आने में कई बार बच्चों की मौत हो जाती है। कई बच्चों की बीमारी और संक्रमण बढ़ जाता है। इसलिए यहां से भी उन्हें रेफर करना पड़ता है। जबकि, समय पर उपचार हो जाए तो बीमारी को ठीक किया जा सकता है। लेकिन सुविधाओं के अभाव में हर माह कई बच्चों की समय से उपचार न मिलने से जान चली जाती है।
अब जान जाने का सिलसिला समाप्त करने की कवायद शुरू हुई है। शासन स्तर से जिले के सभी 14 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में 4-4 बेड की न्यू बोर्न स्टेबलाइजेशन यूनिट (एनबीएसयू) बनाने की कवायद शुरू हुई है। एक पर लगभग चार लाख रुपये खर्च बताया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक कागजी काम लगभग पूरा हो चुका है। इसी माह से वार्ड बनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इसके अगले माह तक शुरू होने की उम्मीद है। इसके बाद लाभ मिलना शुरू हो जाएगा।
बीमार बच्चों को लेकर उनके परिजनों को भागना नहीं पड़ेगा। घर के पास से इलाज हो सकेगा। यह व्यवस्था लागू होने के बाद शिशु मृत्युदर में कमी लाने में भी मदद मिलेगा।