संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। सेहत को लेकर युवाओं में बढ़ती संजीदगी का एक और नमूना होली जैसे पारंपरिक पर्व पर भी देखी जा रही है। संदेश साफ है कि नई पीढ़ी अब सिर्फ उत्साह ही नहीं बल्कि सेहत और पर्यावरण की जिम्मेदारी ओढ़ने को तैयार है। कृत्रिम चमक और तेज खुशबू वाले रासायनिक रंगों से दूरी बनाकर युवा तेजी से इको-फ्रेंडली होली की ओर बढ़ रहे हैं।
यह बदलाव केवल रंग खेलने तक सीमित नहीं है बल्कि होलिका दहन में भी औषधीय महत्व वाली वनस्पतियों के उपयोग पर जोर दिया जा रहा है। तुलसी, सतावर, आंवला, आम, गूलर और चिड़चिड़ा जैसे पौधों का इस्तेमाल कर युवा पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहे हैं। शहर के दिव्यांशु, विशाल, मनीष, बृजेश जैसे युवाओं का कहना है कि रासायनिक रंगों के नुकसान अब किसी से छिपे नहीं हैं। ऐसे में प्राकृतिक रंगों को अपनाना अब केवल विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बनता जा रहा है।
पर्यावरण प्रेमी उमेश श्रीवास्तव बताते हैं कि होली खुशियों और उमंग का त्योहार है, लेकिन यह भी तय करना जरूरी है कि इसे स्वास्थ्य के साथ मनाया जाए।