भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा और नेपाल विदेश मंत्रालय के सचिव समेत अन्य मंत्रालयों के सचिवों के साथ वर्चुवल मीटिंग में नेपाल में चल रही भारतीय परियोजनाओं की प्रगति पर चर्चा हुई थी। उस बैठक में उत्तराखंड के लिंपियाधुरा, लिपुलेख व कालापानी को नेपाल के नक्शे में दिखाए जाने के मुद्दे पर चर्चा नहीं हुई थी।
नेपाल से लगी बिहार सीमा पर करीब 7100 एकड़ भारतीय भूक्षेत्र पर नेपाल द्वारा कब्जा किए जाने का मुद्दा, बिहार सीमा पर नेपाल पुलिस द्वारा भारतीय नागरिकों पर की गई फायरिंग पर भी चर्चा नहीं हुई। प्रस्तावित बैठक में सीमा विवाद, अवैध कब्जा तथा तनाव के अन्य कारणों पर चर्चा किए जाने की तैयारी चल रही है।
भारत नेपाल के बीच तनाव नया नहीं है। लेकिन इसे दूर करने के लिए हमेशा उच्च स्तरीय बैठकें होती रही हैं। यहां तक कि ऐसे ही एक तनाव को दूर करने के लिए 1956 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भी जाना पड़ा था। उसके बाद सर्वपल्ली राधाकृष्णन, वीवी गिरी, डॉ.जाकिर हुसैन, ज्ञानी जैल सिंह और विदेश मंत्री रहते हुए प्रणब मुखर्जी जैसी शख्सियतों को काठमांडू जाना पड़ा था। बेशक भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने कई बार नेपाल की यात्रा की लेकिन उनकी यात्रा ऐसे किसी मौके पर नहीं थी।