सिद्धार्थनगर। बाढ़ प्रभावित जिले में नदी के कई कटान स्थलों पर बचाव और मरम्मत कार्य नहीं होने से बारिश के मौसम मे लोगों के मकान और भूमि पर खतरा मंडराता दिख रहा है। सिंचाई विभाग की तरफ से चिह्नित 39 कटान स्थलों को छोड़कर जिले में नदियों के किनारे 30 कटान स्थल ऐसे हैं, जहां लोगों के घर व भूमि नदी में विलीन होते रहे हैं।
नदियों के कटान में अब तक 60 गांवों के दो हजार से अधिक मकान, 15 हजार एकड़ कृषि भूमि व बाग विलीन हो चुके हैं। मानसून नजदीक आने से बाढ़ पीड़ित अभी से बीते वर्षों की त्रासदी याद कर डरे नजर आ रहे हैं।
राप्ती, बूढ़ी राप्ती, बाणगंगा, कूड़ा व घोघी नदियों के किनारे सिंचाई विभाग से चिह्नित 20 से अधिक अति संवेदनशील कटान स्थल हैं, जहां लोगों के घर, कृषि भूमि व बाग नदी विलीन हो चुके हैं, जबकि विभाग से चिह्नित सिर्फ संवेदनशील 19 कटान स्थलों पर भी बचाव व सुरक्षा के कार्य की दरकार है। इनके अलावा जिले में 30 से अधिक कटान स्थल ऐसे हैं जहां बचाव एवं सुरक्षा उपाय नहीं किए जाने से लोगों के मकान, कृषि भूमि व बाग नदी में गिर रहे हैं।
बूढ़ी राप्ती नदी के उत्तरी तट पर स्थित उसका ब्लॉक के ग्राम हथिवड़ताल के तिवारी डीह टोला कटान के मुहाने पर है। जिससे गांव के लोग सशंकित रहते हैं। उसका लखनापार बांध और बूढ़ी राप्ती नदी के बीच स्थित इस गांव के कई घर गिरकर नदी में विलीन हो चुके है।
गांव के पूर्व प्रधान राधेश्याम व शैलेंद्र नाथ त्रिपाठी का कहना है कि हर वर्ष कटान से मकान, कृषि भूमि व बाग नदी में विलीन हो रहे हैं, लेकिन बचाव एवं सुरक्षा कार्य नहीं हुआ है। बरसात के मौसम में नदियों के बढ़ और घट रहे जलस्तर के बीच वे खुद के मकान नदी में गिरने के खतरे के बीच दिन व रात काटने काे मजबूर रहते हैं। कुछ इसी तरह का हाल जोगिया के ही खजुरडाड़ गांव का भी है जहां कई घर व भूमि बूढ़ी राप्ती नदी की कटान के मुहाने पर हैं।
वहीं, तिवारी डीह टोला निवासी अधिवक्ता वीरेंद्र नाथ त्रिपाठी कहते है कि पिछले वर्षों में हुई कटान से गांव के कई मकान नदी में विलीन में हो गए है। अब जिनके मकान कटान से सटे हैं उनकी सांसों की रफ्तार नदी के बढ़ते-घटते जल स्तर के साथ उठती-गिरती है।
ये हैं अति संवेदनशील कटान स्थल : जिले में विभिन्न नदियों किनारे सिंचाई विभाग ने अति संवेदनशील कटान स्थल चिह्नित किए हैं। इनमें कोड़रवा, सतवाड़ी, सोनौली, जनुका, सिंगारजोत, इमिलिहा, महुवा, तनेजवा, भूतहिया, सेमरा, बरैनिया, नरकटहा, बंजरहा, बेतनार, ककरही, डेंगहर, धनौरा मुस्तकहम, महथावल व जमुआर नाला किनारे शहर के निकट पुरानी नौगढ़ कटान स्थल शामिल हैं।
10 वर्षों में दो हजार बीघा जमीन व घर हो चुका विलीन : भनवापुर ब्लाॅक क्षेत्र से होकर जाने वाली राप्ती नदी की धारा में पिछले 10 वर्षों में क्षेत्र के बेतनार मुस्तहकम, खंता, जूड़ीकुइयां और बिशुनपुर औरंगाबाद गांव के सैकड़ों किसानों का करीब दो हजार बीघा खेती योग्य जमीन राप्ती में समाहित हो चुकी है। जोगिया ब्लॉक अंतर्गत राप्ती नदी पर बसे संगलदीप गांव के लोग हर साल बाढ़ त्रासदी झेलने को मजबूर हैं। कटान से कई घर व खेत हर वर्ष नदी में विलीन होता है। बरसात के सीजन में इनकी धड़कनें बढ़ जाती हैं कि गांव बचेगा या नहीं। राप्ती नदी ने आठ और परिवार के घर को निशाने पर ले रखा है। नदी आबादी की ओर तेजी से बढ़ रही है।