खेसरहा में सिंचाई सुविधा मुहैया कराकर उत्पादन बढ़ाने के लिए नहरों व नलकूपों का जाल बिछाया गया है, लेकिन इन संसाधनों की बदहाली किसानों पर भारी पड़ रही है। एक तरफ नहरें सूखी हैं, वहीं नलकूप बेपानी हो चुके हैं। अवर्षण की इस स्थिति में लाचार किसान अपनी व्यथा किससे करें, यह उनकी समझ से बाहर है।
प्रथम पंचवर्षीय योजना में कुल 39 राजकीय नलकूपों का निर्माण किया गया, लेकिन व्यवस्था की बदहाली बदहाली के चलते वर्तमान में क्षेत्र का ऐसा कोई भी नलकूप नहीं, जिससे खेतों में पानी पहुंच सके। कोई विद्युत स्टार्टर के अभाव में बंद है तो कहीं मोटर खराब है। नालियां अस्तित्व खो चुकी हैं। कहने के लिए इनकी मरम्मत पर हर वर्ष प्रति नलकूप 20 हजार रुपये खर्च किया जाता है, मगर काम सिर्फ कागजों पर होता है। क्षेत्र के ग्राम टिकुईया, सकारपार, सवाडाड़, बेलहरा, सेखुई, कनपुरवा, कडजहर, विशुनपुर मुस्तहकम, नेवटा, बनजरहा, सेमरा मुस्तहकम, डडिय़ाताल, कुडजा, चोरईताल, मड़ोई, गेगटा, पर्रोई, पेड़ारी, कोटिया पांडेय, खपटा, बेलबनवां व छितौनी का नलकूप तकनीकी खराबी से बंद पड़ा है।
सबसे दयनीय स्थिति सरजू नहर के माइनरों की है। कहने के लिए तो सैकड़ों हेक्टेयर उपजाऊ जमीन खोदाई करके आधा दर्जन माइनरों का निर्माण किया गया, लेकिन बनने के डेढ़ दशक बाद भी इनमें पानी नहीं आया। रिठिया, करमैनी व टिकोर माइनर इसका प्रमाण हैं। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि कई बार इसकी शिकायत कर पानी छोडने की अपील की गई, लेकिन नतीजा सिफर रहा।