नल पर खतरे का निशान, फिर भी बुझा रहे प्यास
अधिकांश आबादी प्रतिबंधित देसी नल का पानी पीने को विवश
जिले की 29 लाख की आबादी के लिए लगे हैं मात्र 32 हजार इंडिया मार्का-टू हैंडपंप
शुद्ध पेयजल मुहैया कराने में प्रशासन नाकाम
अमर उजाला ब्यूरो
सिद्धार्थनगर। जिला इंसेफेलाइटिस प्रभावित सूची में शामिल है। बावजूद इसके लोगों को शुद्ध पानी नहीं मिल पा रहा है। यह हाल तब है जब विभाग देसी नलों पर लाल खतरे का निशान लगा चुका है। लेकिन उन जगहों पर पानी पीने की कोई व्यवस्था नहीं की है। मजबूरन लोगों को इन्हीं नलों के सहारे प्यास बुझानी पड़ रही है। जबकि दो दिन पहले ही जिले में इंसेफेलाइटिस के तीन मरीज मिल चुके हैं। बावजूद इसके जिम्मेदार समस्या को लेकर गंभीर नहीं हैं।
जिले की आबादी तकरीबन 29 लाख है। लेकिन शुद्ध पेयजल की व्यवस्था जिले में नहीं है। पूरे जिले में शुद्ध पेयजल मुहैया कराने के लिए 32 हजार इंडिया मार्का-टू हैंडपंप लगाए गए हैं। इनमें अधिकांश हैंडपंपों का हाल खराब है। ऐसे में गांवों में बसने वाली अधिकांश आबादी अभी भी देसी नल के पानी का सेवन कर रही है। ऐसे परिवारों की संख्या दो लाख से अधिक होगी। ये नल 20 से लेकर 60 फीट की गहराई पर लगे हैं। इन नलों के पानी को दूषित घोषित करते हुए लाल निशान लगा दिया गया है। साथ ही लोगों को चेतावनी भी दी गई है कि अगर इस नल का पानी पीते हैं तो वह बीमारी को न्योता दे रहे हैं। लेकिन देसी नलों के स्थान पर कोई अन्य व्यवस्था न विभाग ने की न ही ग्रामीणों ने। ऐसे में खतरे के निशान वाले हैंडपंपों से पानी पीना लोगों की मजबूरी बन गई है। जल निगम के अधिशासी अभियंता पवन यादव ने बताया कि विभाग की तरफ से इंडिया मार्का हैंडपंप लगाए जाते हैं। रिबोर और खराब होने पर पंचायती राज विभाग द्वारा उसकी मरम्मत कराई जाती है। रही बात देसी नल की जगह पर हैंडपंप लगाने की, तो वह निगम नहीं लगवा सकता है।
दूषित जल के सेवन से होता है एईएस
स्वास्थ्य विभाग की माने तो एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) दूषित जल के सेवन करने से होता है। यह बीमारी बहुत ही गंभीर और जानलेवा होती है। इस बीमारी के होने से व्यक्ति दिमागी संतुलन भी खो सकता है। इसके अलावा दूषित पानी का सेवन करने से पेट संबंधित जैसे, लीवर में दिक्कत, पथरी आदि की भी समस्या हो सकती है।
इंसेफेलाइटिस प्रभावित है जिला
भारत-नेपाल सीमा से सटा जिला इंसेफेलाइटिस से प्रभावित भी है। दूषित पानी, सफाई के अभाव जैसे विभिन्न कारणों से यहां हर वर्ष जेई, एईएस जैसी गंभीर बीमारी की चपेट में सैकड़ों की संख्या में बच्चे आते हैं। इसमें कुछ की मौत भी हो जाती है तो कुछ इलाज के बाद भी दिमागी संतुलन खो देते हैं।
32 हजार से अधिक हैं हैंडपंप
जल निगम के आंकड़ों पर गौर करें तो हैंडपंपों की जांच और मरम्मत के लिए हुए सर्वे में 32 हजार से अधिक हैंडपंप तलाशे गए थे। इसमें कुछ पूरी तरह से खराब मिले थे तो कुछ रिबोर योग्य थे।