सिद्धार्थनगर। रात करीब 12 बजे अचानक शोर होने लगा तो सो रहे मरीज परिजन जाग गए। शोर सुनकर मरीजों की धड़कन बढ़ गई थी। उसके कुछ देर बाद ही वार्ड में अचानक लड़के आए और उन्हाेंने ऑक्सीजन बंद कर दिया। उन्होंने भगाना शुरू कर दिया तो परिजन ने बोरिया बिस्तर समेटना शुरू कर दिया। उनकी मुसीबत और बढ़ गई, जिनकी तीमारदार महिलाएं ही थी। चंद समय में ही बाद ही अपने मरीज के बेड के पास फर्श पर दो बच्चों के साथ सो रही सुमन के पास भी पहुंचे तो उसने बोला कि मैं अकेली महिला हूं, एक मरीज है, जबकि दो बच्चे भी हैं। कहां जाऊं। इतना सुनने पर वार्ड की महिलाएं एक स्वर में सामने आई तो उन्हें राहत मिली।
यह दर्द सिर्फ इमरजेंसी के वार्ड में भर्ती मरीजों के महिला परिजन की है, जबकि मेडिकल छात्रों ने अन्य वार्डों में भी इसी प्रकार धावा बोला। वार्ड में गंभीर मरीजाें को ही भर्ती किया जाता है, इस कारण शोर और तांडव से उनकी तबीयत और बिगड़ने की आशंका बढ़ गई। जिनकी धड़कन बढ़ी, उन्हें कोई दवा देने वाला भी नहीं था। हालांकि, पुलिस पहुंची तो उपद्रवी चले गए तो मरीज परिजन के जान में जान आई।
इन महिलाओं के भरोसे ही थे मरीज
इमरजेंसी में मेरी सास भर्ती हैं। घर में कोई पुरुष नहीं था और सास बीमार हो गई तो दो बच्चों को भी साथ लेकर आई हूं। रात में मारपीट और शोर हुआ तो मैं डर गई। वार्ड में लड़के घुसे तो घबराहट बढ़ गई। मुसीबत ऐसी थी कि कुछ समझ में नहीं आ रहा था। फिर तांडव करने वालों के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गई।
-सुमन, विशुनपुर, पथरा
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मेरे पति भर्ती हैं। ठंड लगने के कारण उन्हें अस्पताल लेकर आई और डॉक्टर ने भर्ती कर लिया। मैं अपने मरीज के पास अकेली थी, लेकिन लड़के अंदर घुसे तो भगाने लगे। मैंने तो डर के मारे में बोरिया बिस्तर समेट लिया, लेकिन समझ में नहीं आ रहा था कि कहां जाऊ, उसी दौरान पुलिस आई तो लड़के भागने लगे।
-रेसमा देवी, मदनपुर, उसका बाजार
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मेरे पति को सांस लेने में तकलीफ है। दो दिन भर्ती हैं। जैसे ही लड़के अंदर घुसे तो उन्होंने ऑक्सीजन बंद कर दिया। मेरे पति की घबराहट बढ़ गई। इस समय में मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं। पुरुष डर गए कि वे उन्हें भी पीट सकते हैं। फिर महिलाएं बताने लगी कि उनके पास कोई और नहीं है। फिर वे भाग गए।
-रेखा, खरगौरा, जोगिया
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मेरी बेटी की तबीयत खराब है। वह दो दिन से भर्ती है। अचानक लड़के वार्ड में घुसे तो हर कोई डर गया। सो रहे मरीज भी बैठ गए। लड़के किसी की बात नहीं सुन रहे थे। वे बोल रहे थे कि अस्पताल बंद हो रहा है तो तुम लोग बाहर जाओ, भाग जाओ। इलाज करने वाले भी नहीं सोच पा रहे थे कि जान खतरे में पड़ जाएगी।
-रेनू, हसुड़ी औसानपुर, इटवा