पैरों से ट्रैक्टर चलाते तबर्रुक।
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इटवा। विकलांगता को आधार बनाकर बेबसी का जीवन जीने वालों के लिए जिले के कई चेहरे नजीर हैं। अशक्तता की चुनौती का डटकर सामना करते हुए वह सामान्य लोगों की तरह जीवन जी रहे हैं। उनके नाम भले ही कोई बड़ी उपलब्धि नहीं हो, मगर वह किसी से कम भी नहीं है। ऐसे ही कुछ चेहरों में शुमार हैं इटवा तहसील के ग्राम भावपुर मीरा निवासी तबरूक।
बचपन में हुए एक हादसे में दोनों हाथ गंवाने वाले तबरूक (36) किराना की दुकान चलाते हैं। पैरों से ही ग्राहकों को सामान देते हैं। हर तरह का लेन-देन करते हैं। दो पुत्री व दो पुत्र समेत छह सदस्यीय परिवार का भरण-पोषण वह अपने बूते कर रहे हैं। तवरुक ने गांव में आटा चक्की लगाए हुए हैं। जहां गांव वालों का किराए पर गेहूं की पिसाई व धान की कुटाई का कार्य करते हैं। घर की खेती-बारी भी यह खुद करते हैं। हाथों के न होते हुए भी पैरों से स्टेयरिंग घुमाते ट्रैक्टर से इनकी जुताई देखकर लोग दंग रह जाते है। कस्बे के भीड़-भाड़ में इनकी ड्राइविंग लोगों के लिए मिसाल है।
बढ़नी। छह वर्ष की उम्र में ही पोलियो से ग्रसित हुए मुकेश निगम क्षेत्र के ब्रजवेश्वरी इंटर कॉलेज में शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं। अशक्तता को कभी भी अपनी तरक्की में आड़े नहीं आने दिया। पूरी शिद्दत से वह मंजिल को पाने के लिए जुटे हुए हैं। भदोही जिले के सुरियांवा निवासी मुकेश निगम के मुताबिक परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। ऊपर से अशक्तता ने चिंताएं बढ़ा दी थी, लेकिन कभी भी इसे खुद पर हावी नहीं होने दिया। पिता की प्रेरणा ही जीवन में आगे बढने का आधार बनी। पूर्वांचल यूनिवर्सिटी से एमए के बाद यूजीसी-नेट उत्तीर्ण कर शिक्षक के रूप में चयनित हुए।