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रैन बसेरा पर लगा ताला

Wed, 31 Aug 2016 10:46 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ,सिद्धार्थनगर
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बाहर खाना बनाते मरीजों के परिजन - फोटो : अमर उजाला
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 मरीजों और उनके तीमारदारों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए शासन-प्रशासन की तमाम कोशिशें बुद्धभूमि पर बेअसर साबित हो रही हैं। जिम्मेदारों की बेरुखी और लापरवाही से मरीज दुश्वारियां झेलने को मजबूर हैं। जिला अस्पताल में इसकी कई नजीर कभी भी देखी जा सकती है। कहने के लिए तो यहां रैन बसेरा का इंतजाम किया गया है, मगर हर वक्त ताला चढ़ा होने के कारण मरीज यहां-वहां भटकने को विवश हैं। वार्डों के बाहर गैलरी में ही कइयों ने ठिकाना बना लिया है। वहीं भोजन बन रहा है और रातें भी कट रही हैं। अस्पताल प्रशासन इससे बेपरवाह है।
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जिला अस्पताल परिसर में रैन बसेरे का निर्माण वर्ष 03 में कराया गया था। मंशा यही थी कि अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों के परिजन यहां शरण ले सकेंगे। खाना-पानी का इंतजाम यहीं से करेंगे। शासन की इस मंशा को अस्पताल प्रशासन ने धूल-धूसरित कर दिया है। निर्माण के बाद से अब तक यह रैन बसेरा शुरू नहीं हो पाया। नतीजा रात गुजारने के लिए मरीजों के परिजन ठिकाने की तलाश में भटकते हैं। जिन्हें कोई आसरा नहीं मिलता, वह अस्पताल परिसर में ही ठिकाना बना लेते हैं। कोई वार्डों के बाहर पसरा हुआ तो किसी ने गैलरी में डेरा-डंडा जमा लिया है। सिर्फ डेरा-डंडा ही नहीं बल्कि चूल्हा जलाकर खाना बनाने का काम भी यहीं हो रहा है। नियमानुसार भले ही यह पूरी तरह गलत हो, मगर तीमारदार कोई विकल्प न होने के कारण मजबूरी बता रहे हैं। उनका कहना है कि कई किमी दूर घर से आना-जाना भला कैसे संभव होगा। अगर रैन बसेरा होता तो हम भी यहां ठिकाना नहीं बनाते, लेकिन जब व्यवस्था नहीं तो क्या कर सकते हैं। उधर, अस्पताल प्रशासन इससे पूरी तरह बेपरवाह है। दीवारों पर तो जगह-जगह रैन बसेरे में ठहरने की सूचना दर्शाई गई है, लेकिन व्यवस्था के नाम पर टाल जाते हैं। जिला अस्पताल की मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ.रोचस्मति पांडेय का कहना है कि रैन बसेरा तो है ही, अगर कोई चाहे तो वहां रह सकता है। अस्पताल के गैलरी और वार्डों के बाहर ठहरने और खाना बनाने के सवाल पर वह मौन साध गईं।
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