संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। घर की रसोई, बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की देखभाल और परिवार की पूरी व्यवस्था संभालने वाली गृहिणियों के श्रम को लंबे समय तक आर्थिक पैमाने पर नहीं आंका गया। अब सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले ने इस सोच को बदलने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
शीर्ष अदालत ने सड़क हादसों में गृहिणी की मौत के मामलों में मुआवजा तय करते समय उसके घरेलू श्रम का आर्थिक मूल्यांकन करने और 30 हजार रुपये मासिक आय को आधार मानने की बात कही है। इस फैसले का असर सिद्धार्थनगर के उन सैकड़ों परिवारों पर पड़ सकता है जो सड़क दुर्घटना मुआवजे की लड़ाई लड़ रहे हैं।
परिवहन विभाग के आंकड़ों के हिसाब से जिले में हर साल होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में कुल मौतों का 15 से 20 फीसदी महिलाओं की जान जाती है। ऐसे मामलों में अक्सर यह तर्क सामने आता था कि मृतका की कोई नियमित आय नहीं थी, जिसके कारण मुआवजा निर्धारण में उसका योगदान पूरी तरह परिलक्षित नहीं हो पाता था।
अधिवक्ता सरफराज मलिक कहते हैं कि अब तक पांच हजार रुपये आय मानकर मुआवजा तय होता था। अब 30 हजार रुपये मासिक आय को आधार मानने से मुआवजे की राशि बढ़ सकती है। इससे उन परिवारों को सीधा लाभ होगा, जिनकी आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था पूरी तरह गृहिणी पर निर्भर थी।
कानूनी जानकारों का कहना है कि यह फैसला केवल मुआवजे की रकम बढ़ाने तक सीमित नहीं है बल्कि घरेलू कामकाज को भी सम्मानजनक आर्थिक पहचान देता है। ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में महिलाएं खेत, पशुपालन और घरेलू जिम्मेदारियों का निर्वहन करती हैं लेकिन उनकी मेहनत का कोई प्रत्यक्ष वेतन नहीं होता। अदालत की टिप्पणी ऐसे अदृश्य श्रम को मान्यता देने की दिशा में अहम मानी जा रही है।
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