तरकुलवा। सोहनरिया-चिउटहां में शिव-हनुमान मंदिर प्रांगण में आयोजित रुद्र महायज्ञ के चौथे दिन मंगलवार गोस्वामी तुलसीदास के जन्म, नामकरण और दीक्षा की कथा का हुई। कथा को सुन श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
कथा वाचिका डॉ. लवी मैत्रेयी ने कहाकि पति का मार्ग प्रशस्त करना और धर्म के मार्ग पर चलने में उनकी सहायता करना करना पत्नी का परम कर्त्तव्य है। उन्होंने कहा कि सावन मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को जब तुलसीदास का जन्म हुआ तो उनकी माता का स्वर्गवास हो गया। विवाह के बाद पत्नी रत्नावली के प्रेम में डूब गए। पत्नी के ससुराल चले जाने पर रात्रि में उनसे मिलने निकल पड़े।
खिड़की के पास लटक रहे सर्प को रस्सी समझकर उसे पकड़कर छत के रास्ते पत्नी के कक्ष में पहुंच गए। पत्नी की फटकार पर उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और वे रामभक्त भग बन गए। जिस प्रकार गुरु मार्ग प्रशस्त करते हैं, उसी प्रकार पत्नी भी पति के भाग्य चक्र को सही दिशा में मोड़ने में सहायक होती है।
इसके अलावा कथा वाचिका ने महाराजा दशरथ के अश्वमेध यज्ञ और भगवान राम के जन्म की लीलाओं का वर्णन किया गया। जिसे देखकर दर्शक भावविह्वल हो उठे।