84 के चक्कर में दूसरी डोज में बाधा
टीकाकरण की दूूसरी डोज लगवाने के समय में बदलाव से आ रही दिक्कत
जिला अस्पताल समेत टीकाकरण केंद्रों से प्रतिदिन लौट रहे सैकड़ों लाभार्थी
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। कोरोना वैक्सीन की दूूसरी डोज लगवाने के लिए जिला अस्पताल समेत सभी टीकाकरण केंद्रों से लोगों को लौटाया जा रहा है। इसकी वजह पहले डोज लगने से 84 दिन पूरा नहीं होना प्रमुख कारण हैं। अब सवाल यह कि जिन्हें पहली डोज के समय 48 दिनों को जोड़कर तिथि उनके कार्ड पर अंकित की गई, वह भी निराश लौटने को विवश हैं। विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पहले डोज की तिथि से 84 दिन पूरे होने पर लगेंगे, चाहे वह नए आदेश के पूर्व में ही क्यों न लगा है।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोविशील्ड की दूसरी खुराक लेने के समयावधि में परिवर्तन कर दिया है। शुरूआती दौर में यह 28 दिनों पर दूसरी डोज दी जाती थी। बाद में 48 दिनों पर दूसरी डोज दी जाने लगी। अब 12 से 16 सप्ताह के बीच देने का निर्देश दिया है। इसमें भी अब दूसरी डोज की बुकिंग 84 दिनों से पहले नहीं होगी। जिला अस्पताल समेत सभी टीकाकरण केंद्रों पर नए आदेश से पूर्व में लगवाए पहले डोज के लाभार्थी कार्ड में अंकित तिथि पर पहुंच रहे हैं, पर उन्हें लौटाया जा रहा है। इस बाबत सीएमओ डॉ. संदीप चौधरी ने कहा कि दूसरी खुराक लेने के लिए 84 दिनों पर ऑनलाइन पंजीकरण कर टीका लगवा सकेंगे। इसके पहले यह सुविधा नहीं मिल पाएगी। 84 दिनों का आदेश जारी होने के बाद बाद पोर्टल पर भी परिवर्तन कर दिया गया है। इसके पहले यह सुविधा अब मिलना संभव नहीं है।
इन्हें हुई परेशानी
शनिवार को जिला अस्पताल पर दूूसरी डोज लगवाने के लिए पहुंचे मुड़िला निवासी धर्मेंद्र मिश्रा, भीमापार निवासी वेदप्रकाश श्रीवास्तव, महनगा निवासी गजेंद्र नाथ समेत कामता प्रसाद दुबे, राजेंद्र मणि त्रिपाठी, पूनम त्रिपाठी, शैलजा मिश्रा, राधेश्याम मिश्र, अभिषेक साहनी जैसे लोगों को निराश होना पड़ा। कर्मियों ने बताया कि पहले डोज की तिथि से 84 दिन पूरे होने पर ही दूसरा डोज लगाने का निर्देश मिला है।
कहासुनी की स्थिति से जूझ रहे स्वास्थ्य कर्मी
कोरोना टीका का दूसरी डोज लगवाने वाले लाभार्थियों के गुस्से का शिकार स्वास्थ्य कर्मी हो रहे हैं। उपलब्ध कराए गए कार्ड पर अंकित तिथि के मुताबिक दूसरी डोज लगवाने को लेकर कहासुनी हो जा रही है। कुछ मामले में तो मारपीट की स्थिति उत्पन्न हुई, जहां बीच बचाव से मामला शांत हुआ। इसके पीछे कहीं न कहीं स्वास्थ्य विभाग समेत अन्य जिम्मेदारों की ओर से जागरूकता की कमी प्रमुख कारण है।