भारतीय अर्थव्यवस्था को खोखला करने वाले नकली नोट पाकिस्तान में तैयार होते हैं। छपाई के बाद यह नोट बांग्लादेश पहुंचते हैं। वहां से मालदा, बंगाल, बिहार होते हुए तस्कर खुली सीमा के रास्ते नेपाल ले जाते हैं। नेपाल तस्करों के लिए सबसे महफूज ठिकाना साबित हो रहा है।
यहीं से जाली नोट की खेप सीमावर्ती जिलों के जरिए पूरे देश में पहुंचाई जाती है। तस्कर इसे अलग-अलग हाथों में सौंपते हैं ताकि किसी पर शक भी न हो सके। पुलिस टीम के हाथ लगे तस्करों के गिरोह ने कई महत्वपूर्ण सुराग दिए हैं।
पूछताछ में यह भी सामने आया है कि बिहार के रक्सौल बॉर्डर से लगते नेपाल के वीरगंज में तस्करों का मजबूत नेटवर्क है। जहां से इस कारोबार का संचालन होता है। वहां से नोट आसानी से भारत से लगते सीमावर्ती क्षेत्रों में एक से दूसरे क्षेत्र तक पहुंचा दिया जाता है। फिर भारतीय क्षेत्र में मौजूद गिरोह के सदस्य जाली नोट यहां लाकर उसका वितरण करते हैं।
गोरखपुर जोन के सिद्धार्थनगर, महराजगंज का एरिया इनका मुख्य क्षेत्र है। देश के सभी हिस्सों की रेल लाइन से सीधे संपर्क होने के कारण जाली नोट एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से पहुंच जाता है। तस्कर खुद को सुरक्षित रखने के लिए नोट की एकमुश्त खेप देने के बजाय अलग-अलग हाथों में छिटपुट नोट सौंपते हैं। असली के साथ दो-चार की संख्या में मिलाकर दिए जाने वाले जाली नोट पर किसी को संदेह भी नहीं होता और तस्कर अपने काम में सफल भी हो जाते हैं।
आधे रेट पर जाली नोट ः भारतीय मुद्रा से हुबहू मिलता जाली नोट तस्करों को आधे रेट पर उपलब्ध होता है। वह उसे 15 प्रतिशत के मुनाफे पर आगे पहुंचाते हैं।