सिद्धार्थनगर। कपिलवस्तु क्षेत्र के अंतर्गत प्राचीन टीलों की सुरक्षा अब बढ़ाई जाएगी। बौद्ध क्षेत्र के पिपरासन टीले में अवैध खनन का मामला उजागर होने के बाद पुलिस प्रशासन सक्रिय हुआ है। प्रशासन की संयुक्त टीम ने मंगलवार देर शाम बौद्ध क्षेत्र में भ्रमण करके अवैध खनन एवं क्षरण की स्थिति देखी। मौके पर पहुंचे एसडीएम डॉ. ललित मिश्रा ने संबंधित अधिकारियों पर नाराजगी जाहिर करते हुए ऐतिहासिक महत्व वाले स्थानों पर पुलिस की गश्त बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। इन स्थलों को कंटीले तारों से संरक्षित करने की भी योजना है।
टीम के साथ पहुंचे एसडीएम ने पिपरसन के अलावा गनवरिया और सालारगढ़ सहित अन्य स्थानों की स्थिति भी देखी। एसडीएम ने कहा कि प्राचीन टीलों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग एवं राज्य पुरातत्व विभाग से संवाद किया जाएगा। उसके बाद प्राचीन टीलों को संरक्षित करने की प्रक्रिया शुरू होगी। खंड विकास अधिकारी के माध्यम से प्राचीन टीलों को कटीले तारों से घेरने की कवायद शुरू कराई जाएगी।
बौद्ध काल से भी प्राचीन साबित हो सकता है कपिलवस्तु का इतिहास
सिद्धार्थनगर। महात्मा बुद्ध के क्षेत्र में पुरातात्विक शोध की आवश्यकता है। कपिलवस्तु का इतिहास पाषाण काल तक प्राचीन साबित हो सकता है। विशेषज्ञों के गहन अध्ययन हो तो कपिलवस्तु परीक्षेत्र कम से कम 10 से 20 हजार साल पुराना साबित हो सकता है। कपिलवस्तु क्षेत्र में कपिलवस्तु, गनवरिया और सालारगढ़ स्तूप को संरक्षित घोषित किया गया है, इस क्षेत्र में कई प्राचीन टीले अपनी प्राचीनता की गवाही देने लायक हैं।
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु के प्राचीन इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के सहायक आचार्य डॉ. शरदेंदु त्रिपाठी बताते हैं कि कपिलवस्तु और गनरिया क्षेत्र में मिली पुरातात्विक सामग्री भी इस बात का संकेत करती है कि इस क्षेत्र में मानव बसाहट अत्यंत प्राचीन काल से ही शुरू हुई थी थी। कपिलवस्तु क्षेत्र ढाई हजार वर्ष से अधिक पुराना है जबकि यहां पाषाण काल के अवशेष भी मिल सकते हैं।
यह बौद्ध क्षेत्र के अंतर्गत आता है। वृहद हिमालय के शिवालिक परिक्षेत्र की पाषाण काल के अवशेष पाए जाते हैं। अश्व घोष के बुद्धचरित में ऐसा विवरण आता है कि कपिलवस्तु गणराज्य की स्थापना शाक्यों ने की थी। कपिलमुनि का आश्रम एक सरोवर के पास स्थित है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि कपिलवस्तु में शाक्यों से पहले भी संस्कृति पल्लवित हो रही थी। यह क्षेत्र शोध की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है। कपिलवस्तु क्षेत्र के टीलों का उत्खनन हो तो क्षेत्र में नेपाल के लुंबिनी से भी अधिक पुरातात्विक के साक्ष्य प्राप्त होने की संभावना है।