सिद्धार्थनगर। बिजली गुल होने के बाद जिला अस्पताल की व्यवस्था भगवान भरोसे हो जाती है। मंगलवार को इसका नजारा सरेआम था। पूरे जिले की बत्ती गुल थी तो अस्पताल में भी अंधेरा छाया हुआ था। उमस भरी गर्मी में मरीज और उनके तीमारदार छटपटाते रहे। कोई पंखा झल रहा था तो कोई कपड़े से ही हवा कर मरीजों को राहत देने में जुटा हुआ था। इस अव्यवस्था के बाद भी अस्पताल प्रशासन संवेदनहीन बना रहा। हर माह लाखों रुपये जनरेटर पर खर्च होने के बाद भी जरूरत के समय इसे चालू करने की जरूरत नहीं समझी गई। यही नहीं, जिम्मेदार यह भी दलील देते रहे कि उनके पास इतना बजट नहीं है कि वह हर वक्त जनरेटर ही चलवाते रहें।
132 केवी लाइन में फाल्ट के चलते सोमवार की रात से पूरे जिले की विद्युत व्यवस्था ध्वस्त थी। हॉट लाइन से जुड़ा जिला अस्पताल भी इससे अछूता नहीं रहा। बिजली गुल होने के बाद कुछ घंटे तक तो जनरेटर चलता रहा, मगर बाद में यह कहकर जनरेटर बंदकर दिया गया कि तेल नहीं है। इसके बाद मरीजों के पास गर्मी में छटपटाने के सिवा कोई विकल्प नहीं था। इमरजेंसी से लेकर महिला वार्ड, जनरल वार्ड, बच्चा वार्ड हर तरफ उमस भरी गर्मी में लोगों का बुरा हाल रहा।
मरीज तो परेशान थे ही साथ आए तीमारदार भी सांसत में रहे। गर्मी से राहत के लिए वह बार-बार गैलरी तो कभी बाहर की ओर भाग रहे थे। हाथ में पंखा लेकर तो कोई पेपर और गत्ते से हवा करता रहा। पानी में कपड़ा भिंगोकर भी शरीर को राहत देने की कोशिश रही।
एक्स-रे कराने के लिए मरीज भी बिजली का इंतजार करते रहे। उमसभरी गर्मी में तड़पते, छटपटाते मरीजों की पीड़ा से जिम्मेदार बेखबर रहे। नाम न छापने की शर्त पर अस्पताल के कर्मचारियों ने बताया कि कहने को तो अस्पताल में हर वक्त जनरेटर की सुविधा है। इस मद में लाखों रुपये हर माह खर्च भी होता है, लेकिन संचालन सिर्फ कागजों पर हो रहा है। बेहद आवश्यक होने के बाद ही जनरेटर चालू होता है।