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‘मानवता से है विज्ञान का संबंध’

Thu, 07 Dec 2017 10:52 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
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िसद्धार्थ विश्वविद्यालय में व्याख्यान देते पूर्व कुलपति यूपी सिंह। - फोटो : अमर उजाला
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बर्डपुर। विज्ञान का सीधा संबंध मानवता से है। भारतीय विज्ञान ने जो कुछ भी पैदा किया विश्व के परिप्रेक्ष्य में है। बहुत लोगों की धारणा है कि यहां से पहले पश्चिमी सभ्यता में विज्ञान आया। लेकिन सत्यता यह है कि पश्चिमी देशों में विज्ञान 450 वर्ष से ही है। उससे पहले अरस्तू नामक दार्शनिक का आधिपत्य रहा। शासन व धर्मशास्त्र दोनों का संरक्षण अरस्तू को प्राप्त रहा। उस समय अवधारणा रहा कि वह जो कहेगा वहीं सत्य है। जिसने भी विरोध किया, वह शासन व धर्म दोनों का विरोधी माना जाएगा, उसे दंड का भागीदार माना जाएगा।
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ये बातें पूर्व कुलपति पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर प्रोफेसर यूपी सिंह ने कही। वह सिद्धार्थ यूनिवर्सिटी के वाणिज्य संकाय भवन में चल रहे दीक्षांत सप्ताह के तीसरे दिन गुरुवार को विश्व परिप्रेक्ष्य में भारतीय विज्ञान विषय संगोष्ठी पर व्याख्यान दे रहे थे। 
उन्होंने कहा कि गैलीलियो ने टेलिस्कॉप से तारों की गति को देखा व अध्ययन किया। सभी को बताया कि सूर्य नहीं पृथ्वी चारों तरफ घूमती है। उस वक्त सभी अंधविश्वासी थे, उनका मानना था कि अरस्तू ने जो कहा, वही सही है, उसके बाद बाकी सब गलत। तथ्यों की क्रमबद्धता व तुलनात्मक अध्ययन ही विज्ञान है। विज्ञान की गतिविधि पांच चरणों मे चलती है। जिसमें जिज्ञासा, प्रयोग, परीक्षण, निरीक्षण व निष्कर्ष। जो दृष्यमान है वही विज्ञान की सीमा है। विज्ञान से ऊपर उठकर एक ऐसी सीमा है जिसे अध्यात्म कहते है। 
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आइंस्टाइन ने कहा है विज्ञान के पास अध्ययन के लिए संसाधन क्या है। गीता के सातवें अध्याय में ज्ञान और विज्ञान के संबंध बताया गया है। परम तत्व हर जगह विद्यमान है। लोगो ने परम तत्व से छेड़छाड़ शुरू कर दिया है, इसे बंद करना होगा। अंक गणित, दशमलव, परिधि, पाई का मान, पाइथागोरस सूत्र का ज्ञान सबसे पहले भारत ने दिया। कलकुलेस का सूत्र सबसे पहले भारतीय गणितज्ञ भास्कर ने दिया। विभागाध्यक्ष गणित विभाग गोरखपुर विश्वविद्यालय प्रोफेसर सुधीर कुमार श्रीवास्तव ने कहा प्रारंभिक से वर्तमान काल तक का अध्ययन करना चाहिए। जिससे बौद्धिक और मनोवैज्ञानिक विकास हो। कुलपति प्रोफेसर रजनीकांत ने कहा भारत के पास स्वर्णिम इतिहास है। चाणक्य के अर्थशास्त्र में जीवन के सभी विधाएं दर्शायी गई है। जिसका सार सामाजिक, राजनीतिक से ऊपर उठ कर संपूर्ण जीवन का दर्शन कराता है। समंयवक दीपक बाबू ने भी व्याख्यान दिया।
संचालन सहायक प्रो. शिवम शुक्ल ने किया। इस दौरान प्रोफेसर सुरेंद्र नाथ मिश्र, डॉ. धर्मेंद्र द्विवेदी, रामशंकर मिश्र, अमरेश चौधरी, अर्जुन कुमार, सीमा जायसवाल, सिमरन मिश्रा, स्मारिका सिंह, प्रीति उपाध्याय, संस्कृति श्रीवास्तव, कुमकुम उपाध्याय, हिना परवीन, प्रभात अग्रहरि, ऋचा सिंह, अमित वर्मा, सृष्टि मिश्रा, सोनल कसौधन, ज्योति वर्मा, एकता सिंह, ध्वनित सिंह, अभिषेक पांडेय, आशीष जायसवाल, जय प्रकाश, हरिश्चंद, अंब्रेश पांडेय, सृष्टि कसौधन, फरान, सिराज, संजय, पंकज, विशाल चतुर्वेदी, आदित्य, परवेज, इमामुद्दीन, मैनुद्दीन, वसीउल्लाह, दीपक आदि मौजूद रहे।
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