मरीजों को बेहतर दवा-उपचार में मदद के लिए जिला अस्पताल में स्थापित रोगी सहायता केंद्र कागजों में चल रहा है। अस्पताल आने वाले मरीजों को यह तक पता नहीं कि पांच महीने पहले शुरू हुआ यह केंद्र है कहां।
शासन ने इस केंद्र में पांच कर्मचारियों की तैनाती की है। अन्य संसाधनों के लिए भी बजट मुहैया करा दिया है, बावजूद व्यवस्था हवा-हवाई है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत प्रदेश के उच्च प्राथमिकता वाले 25 जिलों के जनपद स्तरीय चिकित्सालयों में रोगी सहायता केंद्र की व्यवस्था की गई है। इस केंद्र का मकसद अस्पताल में दवा-इलाज के लिए आने वाले मरीजों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने में मदद करना है।
केंद्र यह भी सुनिश्चित करेगा कि अस्पताल में इलाज के नाम पर मरीज का कहीं उत्पीड़न तो नहीं किया जा रहा। इस फीडबैक के आधार पर ही स्वास्थ्य सेवाओं की कमियों को दूर किया जाना है। मगर जिले में यह केंद्र खुद अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ गया है। कागजों में जुलाई माह से स्थापित केंद्र गतिविधियां ठप पड़ी हुई हैं। अस्पताल आने वाले मरीजों को यहां तक नहीं पता कि उनकी मदद के लिए कोई केंद्र भी है। काउंटर से पर्ची कटाकर वह भटकतेे हैं।
डॉक्टरों के चेंबर के बाहर धक्के खाते हैं, बाहर की दवाएं खरीदने को मजबूर हैं। बुधवार को अस्पताल आए पुरानी नौगढ़ के वीरेन्द्र, थरौली के विपिन का कहना था कि अस्पताल में तमाम कमियां हैं, मगर अपनी पीड़ा कहें किससे, सुनने वाला भी तो कोई नहीं। ऐसे किसी केंद्र के बारे में जानकारी ही नहीं है।
रोगी सहायता केंद्र के प्रबंधक संतोष कुमार सिंह ने बताया किजिला अस्पताल परिसर के एक कोने में कमरा मिला है, हालांकि उस पर बोर्ड नहीं लगा है। फर्नीचर के लिए बजट आ चुका है। शीघ्र खरीदारी का आश्वासन मिला है। केंद्र को फ्रंट पर लाने की भी कोशिश की जा रही है।