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Siddharthnagar News: जमीन के फर्जीवाड़े में मुकदमा दर्ज भी हो गया तो विवेचना पूरी होने में बीत जाएगी उम्र

Wed, 17 May 2023 11:45 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
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तहसील शोहरतगढ़।
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सिद्धार्थनगर। जमीन की खरीद-फरोख्त के दौरान जालसाजों के फेर में फंस गए तो तहसील और थाने का चक्कर लगाने में एड़ियां घिस जाएंगी। भागदौड़ कर किसी तरह से रिपोर्ट दर्ज भी हो गई तो विवेचना पूरी होने की राह आसान नहीं होगी। पीड़ितों का इधर-उधर चक्कर लगाना पड़ता है। कभी तहसील तो कभी थाने का चक्कर लगाने को पीड़ित विवश रहते हैं।
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जानकारी के अभाव में जमीन खरीदने के दौरान लोग जालसाजी का शिकार हो जाते हैं। लालच देकर दलाल जमीन बेचने के बाद किनारा कस लेते हैं। फर्जीवाड़ा होने पर जमीन खरीदने वालों की परेशानी बढ़ जाती है। किसी तरह से भागदौड़ करने के बाद अगर केस दर्ज भी हो जाए तो विवेचना पूरी होना आसान नहीं होता है। कानूनी पेच में उलझे पीड़ित को इधर-उधर भटकना पड़ता है। हमेशा मुकदमे की तारीख देखने से लेकर थाने तक पीड़ित चक्कर लगाते हैं। कई बार ऐसा मामला आता है कि जमीन खरीदने वाले व्यक्ति को कब्जा भी नहीं मिल पाता है। पहले तो मोटी रकम खर्च हो जाती है, दूसरे कब्जा के लिए इधर-उधर भटकना पड़ता है। विक्रेता कब्जा नहीं करने देते हैं। फर्जी दस्तावेज तैयार कराकर जमीन को बेच देने, एक ही जमीन या प्लाट कई लोगों को बेच कर लोगों के रुपये हड़प लेते हैं। पीड़ितों को मुकदमा दर्ज कराने के लिए जूझना पड़ता है। तहरीर लेकर पीड़ित जब थाने पर जाते हैं तो पुलिस सुनवाई नहीं करती। इसके बाद लोग एसपी के पास फरियाद करते हैं। एसपी के संज्ञान में मामला आने पर ही एफआईआर दर्ज होती है। इसके बाद पुलिस की विवेचना की प्रक्रिया शुरू होती है। अधिवक्ता शेषमणि प्रजापति का कहना है कि अधिकांश प्रकरणों में मुकदमा दर्ज कराने के बाद पीड़ित कानूनी लड़ाई में पीड़ित फंसे रहते हैं। एक ओर उनकी मेहनत की कमाई जमीन खरीदने में डूबती है। दूसरी ओर बचीखुची रकम मुकदमों में खर्च होती है।

दस्तावेजी प्रमाण जुटाने की वजह से होता है बिलंब
जालसाजी के मुकदमों में दस्तावेजी प्रमाण जुटाने की वजह से विलंब होता है। जब तक मामले की जांच चलती है। तब तक वादी खुद या अपने अभिवक्ता के जरिए पैरवी में जुटे रहते हैं। दीवानी कचहरी के अधिवक्ताओं का कहना है कि बिना विवेचना पूरी हुए कोर्ट में चार्जशीट दाखिल नहीं होगी। चार्जशीट फाइल होने के बाद मुकदमे की सुनवाई शुरू होगी। विवेचना में किसी तरह के दस्तावेज की कमी से अभियुक्त को मुकदमे का लाभ मिल सकता है। चार्जशीट समय से फाइल नहीं होने के कारण जेल भेजे गए अभियुक्तों को आसानी से जमानत मिल जाती है।
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यह होती है विवेचना की प्रक्रिया
जमीनों की खरीद-बिक्री में हुई जालसाजी के प्रकरणों में सबूत जुटाने में काफी समय लगता है। दर्ज मुकदमे के आधार पर विवेचक कार्रवाई शुरू करते हैं। इसमें सबसे पहले वह पीड़ित के पास मौजूद दस्तावेजों की फोटो कापी मांगते हैं। उसके मूल दस्तावेजों की जांच करते हैं। इसके बाद विवेचक निबंधन कार्यालय, तहसील और भू राजस्व विभाग के रिकार्ड के लिए लिखापढ़ी करते हैं। तहसीलदार के नाम से आवेदन करके रिकार्ड की प्रमाणित छायाप्रति मांगते हैं। इसमें काफी समय लग जाता है। कभी विवेचक के पास समय नहीं होता है तो कभी राजस्वकर्मी मौजूद नहीं रहते। इससे विलंब होता है।

जांच की यह प्रक्रिया अपनाती है पुलिस
इस तरह के मामलों की विवेचना करने वाले पुलिसकर्मियों ने बताया कि जमीन की जालसाजी से जुड़े मामलों में पुलिस सबसे पहले यह जानकारी जुटाती है कि किससे गलती हुई है। उसे चिह्नित किया जाता है। उसके बाद सभी तथ्यों को केस डायरी (सीडी) में दर्ज किया जाता है। इसकी कार्ययोजना बनाकर उच्चाधिकारियों को बनाकर उनसे अनुमति ली जाती है। धोखाधड़ी के आधार पर साक्ष्य जुटाकर विवादित दस्तावेजों का प्रमाणीकरण, सभी पक्षों के हस्ताक्षर, अंगूठा छाप इत्यादि जुटाया जाता है। सबसे ज्यादा समय तहसील से रिकाॅर्ड जुटाने में लगता है।

चार्जशीट के लिए 90 दिन का समय निर्धारित है। इसके बाद भी पुलिस लापरवाही करती है। जमीन या अन्य जालसाजी के मामलों में दस्तावेजी प्रमाण जुटाने में विलंब होने का हवाला विवेचक देते हैं। लंबित मामलों का निस्तारण करने के लिए पीड़ितों को थाने से लेकर पुलिस अधिकारियों का चक्कर लगाना पड़ता है। सभी प्रक्रिया पूरी होने में देर हो जाती है।
- अखंड प्रताप सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता

जालसाजी के मुकदमों की विवेचना में प्रमाण जरूरी होते हैं। जमीन के मुकदमों में पुलिस को रजिस्ट्री कार्यालय, तहसील सहित अन्य जगहों से कागजात लेने पड़ते हैं। राजस्व के रिकार्ड जुटाने में समय लगता है। इस वजह से भी विवेचना में विलंब होता है। कभी- कभी कुछ विवेचक जानबूझकर मामले को टालते हैं।
- कृपाशंकर त्रिपाठी, अधिवक्ता

केस एक : पहले डूबा 55 लाख, फिर कोर्ट कचहरी में खर्च हुए पांच लाख
शहर के खजुरिया निवासी फारूख ने साड़ी तिराहे के पास तीन बीघा जमीन खरीदने के लिए जिन प्रापर्टी डीलरों से सौदा किया, उन्होंने भूमि स्वामी का फर्जी पहचान पत्र बनवा बैंक खाता खुलवाया था। तीन बीघा के लिए फारूख ने 35 लाख उसके खाते में और 15.50 लाख रुपये नगद दिए, साथ ही चार लाख का स्टांप बेकार गया। मार्च 2020 में हुई ठगी की घटना में जून 2020 में केस दर्ज कर सात गिरफ्तार हुए। वर्तमान में मुख्य आरोपी सेराज समेत सभी जमानत पर बाहर हैं। फारूख का कहना है कि फर्जीवाड़े में 55 लाख डूबने के बाद अब कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाते हुए पांच लाख से अधिक खर्च हो गए, जबकि आरोपी बाहर घूम रहे हैं।

केस दो: फर्जी भूमि रजिस्ट्री, पीड़ित लगा रहा कोर्ट का चक्कर
बर्डपुर नंबर नौ टोला शिवपुर निवासी इंद्रप्रकाश उर्फ पहलवान की दो भूमि 20 वर्ष पूर्व दो लोगों ने फर्जी तरीके से बैनामा करा लिया। आरोपियों ने उसकी जगह फर्जी तरीके से दूसरे को खड़ा कर भूमि खुद बैनामा करा लिया। पीड़ित मामले में थाने व कचहरी का चक्कर लगाते हुए वह फर्जीवाड़ा करने वालों पर कार्रवाई की मांग करता रहा। दो वर्ष पूर्व कोर्ट में वाद दाखिल कर दोषियों पर कार्रवाई की मांग की। मामले में वह कचहरी में तारीख देखने के लिए चक्कर लगाने को मजबूर है।

विवेचना का निस्तारण समयबद्ध किया जाता है। सभी जरूरी प्रक्रिया पूरी करने के बाद ही विवेचक रिपोर्ट लगाते हैं, इसमें कोई लापरवाही पुलिस नहीं करती है। हालांकि, इस मामले में जांच की जाएगी। विवेचना में लापरवाही मिली तो कार्रवाई की जाएगी।
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- अमित कुमार आनंद, पुलिस अधीक्षक
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