बर्डपुर ब्लाॅक में जर्जर भवन में रह रहे कर्मचारी।
- फोटो : अमर उजाला
बर्डपुर। दिन भर काम के बोझ को झेलते हुए शाम को घर पहुंचते ही बर्डपुर ब्लॉक के कर्मचारी गहरी चिंता में डूब जाते हैं। उनकी चिंता है कि जिस छत के नीचे उन्हें रात गुजारनी है, वह सुबह तक सही-सलामत रहेगी या नहीं। ब्लॅाक परिसर में कर्मचारियों के लिए 5 दशक पहले बने आवास जर्जर हो चुके हैं। छत की सीलिंग जगह-जगह क्षतिग्रस्त है। दरवाजे-खिड़कियां उखड़ रहे हैं। फर्श और दीवारों के दम तोड़ने से उनमें रहना कर्मचारियों के लिए खतरे का सबब बना हुआ है।
70 के दशक में बर्डपुर ब्लॉक की स्थापना के साथ ही परिसर में पश्चिम छोर पर आठ कर्मचारी आवासों का निर्माण किया गया था। मंशा थी कि कर्मचारी ब्लॉक मुख्यालय पर बने आवासों में रहेंगे तो कामकाज आसानी से कर सकेंगे। निर्माण के दशकों बाद मरम्मत और देख-रेख के अभाव में आवास जर्जर हो चुके हैं। देखने में खंडहर जैसे प्रतीत होते इन आवासों में रहना जोखिम भरा है, इसके बावजूद कोई अन्य विकल्प न होने से कर्मचारी मजबूर हैं। दिन भर ब्लॉक क्षेत्र में दिमाग खपाने के बाद रात में चैन की नींद के लिए आवास पर पहुंचने वाले कर्मचारियों के मन में हर समय भय बना रहता है कि कहीं आवास धराशायी न हो जाए। हल्की सी बरसात में ही छत टपकने लगती है। पूरा परिसर पानी से भर जाता है। ऐसे समय में आवासों से निकलना भी दुश्वार हो जाता है।
आवास में रह रहीं सेक्रेट्री गायत्री देवी, गोपेश्वर पटेल, रामनरायण झा, विजय मिश्र, अनिल मिश्र, पंचराजी देवी, रामदौड़ सिंह, चंद्रभूषण तिवारी का कहना है कि जर्जर आवासों के कारण बराबर खतरा बना रहता है। कई बार इस संबंध में उच्चाधिकारियों को अवगत कराया गया, लेकिन आवासों की मरम्मत व पुनर्निर्माण की कोई पहल नहीं की जा रही। इस संबंध में बीडीओ संतोष कुमार सिंह का कहना है कि आवासों की स्थिति के बारे में रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को भेजी गई है। दोबारा रिमाइंडर कर इनके मरम्मत व निर्माण के लिए प्रयास कराया जाएगा।