डॉक्टर साहब, जल्दी उपचार शुरू करिए। चोट आई है, खून निकल रहा है, कब दवा मिलेगी। यह तो इमरजेंसी है, फिर इतनी सुस्ती क्यों। फार्मासिस्ट, कर्मचारी कहां है। उनकी हड़ताल, मरीजों की जान से ज्यादा जरूरी है क्या। कुछ ऐसे ही सवाल थे बुधवार को जिला अस्पताल की इमरजेंसी में आई उसका के नरसिंहपुर निवासी ज्ञानमति के। दुर्घटना में जख्मी पति को स्ट्रेचर पर लिटाकर रोती-बिलखती ज्ञानमति अपने पुत्र के साथ डॉक्टरों से मिन्नतें कर रही थी। ड्यूटी पर तैनात चिकित्सक डॉ.लाल प्रसाद अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहे थे, मगर कोई सहयोगी कर्मचारी न होने के कारण वह भी परेशान थे।
सिर्फ ज्ञानमति ही नहीं, बल्कि बुधवार को जिला अस्पताल आने वाले दर्जनों मरीजों को ऐसे ही दुश्वारियों से जूझना पड़ा। दर्द से कराहते, छटपटाते मरीजों को लेकर परिजन भटकते रहे, लेकिन उन्हें पर्याप्त उपचार नहीं मिल सका। दरअसल, विभिन्न मांगों को लेकर फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन से लेकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तक दूसरे दिन भी हड़ताल पर रहे। नतीजा ओपीडी की सेवाएं तो चरमराई ही, इमरजेंसी की चिकित्सा व्यवस्था भी ध्वस्त रही। ड्यूटी पर तैनात चिकित्सक ही मरीजों की पर्ची काट रहे थे, चेकअप कर रहे थे और दवाएं देते रहे। उनकी मदद के लिए टे्रनी फार्मासिस्ट को भी लगाया गया था, लेकिन आंदोलनकारियों ने उन्हें भी काम करने से रोक दिया। हड़ताल का असर यह रहा कि अस्पताल के सभी वार्ड पूरी तरह खाली रहे। 36 घंटे के दौरान इमरजेंसी में भी कोई मरीज भर्ती नहीं हुआ। मंगलवार की सुबह से ठप स्वास्थ्य सेवाएं बुधवार को दोपहर तक यथावत रही। अपराह्न दो बजे हड़ताल खत्म होने की सूचना आई, तब तक ओपीडी का समय खत्म हो चुका था। सैकड़ों मरीज जिला अस्पताल आकर निराश लौट गए।
भटकते और तड़पते रहे मरीज::
खून की कमी से शरीर कमजोर है। इलाज के लिए आए तो डॉक्टर ने हड़ताल का हवाला देकर गोरखपुर जाने को कहा है। जेब में पैसे नहीं है, अब गोरखपुर कैसे जाएं। उपचार नहीं हुआ तो भगवान जाने क्या होगा। -पिहुल, लोटन।
बच्चे को बुखार है। इलाज के लिए सुबह से ही अस्पताल में बैठे हुए हैं। कोई डॉक्टर नहीं है। कब तक आएंगे, यह भी नहीं पता चल रहा। अब कहां जाएं, क्या करें, कुछ भी समझ नहीं आ रहा। -संजय चौधरी, ककरहवा।
आंख के इलाज के लिए यहां आए हैं। जल्दी नंबर लगाने के लिए सुबह आठ बजे ही आ गए थे, मगर पर्ची तक नहीं कटी। तीन घंटे से डॉक्टर के इंतजार में बैठे हैं, न जाने कब उपचार होगा और दवा मिलेगी। -नयनमती, पकड़ी।
पेट में तेज दर्द है। सुबह 10 बजे से बैठे हैं। इलाज नहीं हो पा रहा। हड़ताल के कारण कल भी लौट गए थे। अभी कितना देर बैठना पड़ेगा, पता नहीं। कर्मचारी हड़ताल पर है, फिर डॉक्टर कहां हैं। -भारत, विनायक।
हड़ताल खत्म हुई तो बंद हो चुकी थी ओपीडी
सिद्धार्थनगर। डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन, स्टाफ नर्सेज एसोसिएशन, लैब टेक्नीशियन, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी संघ, एक्सरे कर्मचारी एसोसिएशन के संयुक्त बैनर तले स्वास्थ्य कर्मचारियों की हड़ताल बुधवार को मुख्यमंत्री के आश्वासन पर समाप्त हो गया। मंगलवार से कार्य बहिष्कार कर धरना दे रहे कर्मचारियों ने पूरे दिन काम-काज ठप रहा। मांगों के समर्थन में नारे लगाए। इसके चलते ओपीडी और इमरजेंसी की सेवाएं भी बाधित रही। प्रदेश नेतृत्व की मुख्यमंत्री से वार्ता में सार्थक परिणाम के बाद संघ ने आंदोलन समाप्ति की घोषणा की। करीब दो बजे हड़ताल खत्म होने का ऐलान हुआ, तब तक ओपीडी पर ताला लग गया था। नतीजा लगातार दूसरे दिन भी मरीजों का उपचार नहीं हो पाया। विरोध प्रदर्शन व धरना में जिलाध्यक्ष गोविंद ओझा, अशोक तिवारी, वाईपी यादव, दूधनाथ तिवारी, केएन शुक्ला, समशुल हक, जेआर पांडेय, उर्मिला राव, कमला वर्मा, बी.नारायण, ओपी लाल, उदयराज, सुरेंद्र सिंह, विजय पासवान आदि शामिल रहे।