चेहल्लुम पर गुरुवार को पूरा हल्लौर गांव या हुसैन या अली की सदाओं से गूंजता रहा। सुबह करीब 11 बजे गांव की दोनों कदीमी अजुंमने मातम करती हुई बस्ती-डुमरियागंज मुख्य मार्ग पर पहुंची। जहां अकीदतमंदों ने जंजीरी मातम किया। इसके पूर्व यहां मजलिस का आयोजन किया गया। इसमें अकीदतमंदों को कर्बला की दास्तां विस्तार से सुनाया गया।
मजलिस के बाद अकीदतमंदों ने नौहा व सीनाजनी भी किया। बुधवार की रात गांव के सभी घरों में ताजिया रखा गया। नौहा व मजलिस का सिलसिला रातभर चलता रहा।
गुरुवार की सुबह गांव की अंजुमन गुलदस्ता मातम और फरोग मातम पूरे गांव में घूमकर नौहा व मातम करते हुए बस्ती-डुमरियागंज मुख्य मार्ग पर स्थित गांव के चौराहे पर पहुंची। वहां हुई मजलिस में मौलाना जमाल हैदर व जाकिर अजीम हैदर ने कर्बला की घटना को विस्तार से बताया।
उन्होंने बताया कि किस तरह इमाम हुसैन व उनके बहत्तर साथियों को 40 दिनों तक भूखा प्यासा रखकर शहीद किया गया था। कर्बला की दास्तां को सुनकर अकीदतमंदों की आंखों से जारकतार आंसू बहने लगे। मजलिस के बाद एक बार फिर या अली या हुसैन की सदाओं के साथ दोनों अंजुमनों के लोगों ने मिल कर मातम किया। मातम के बाद जंजीर व कमा का वो मातम हुआ जिसमें लोगों ने अपने शरीर को खून से लाल कर लिया। करीब 3 बजे हल्लौर के सभी घरों के लोग अपने अपने ताजिया को लेकर कर्बला की तरफ रवाना हुए।