सिद्धार्थनगर। बेसिक शिक्षा विभाग स्वयं ही फर्जी शिक्षकों को बचाने में जुटा। तभी तो विभाग द्वारा ऐसे शिक्षकों की जांच सहायक शिक्षा निदेशक के आदेश के बाद भी नहीं की गई। सूत्रों के अनुसार, ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि प्रमाण पत्रों के सत्यापन में भी बड़ा ‘खेल’ हुआ है। इसमें बीएसए कार्यालय से जुड़े कुछ लिपिक भी शामिल हैं।
ऐसे में अगर ठीक प्रकार से जांच हो जाए तो कई बड़े राज खुल जाएंगे। चर्चा तो यहां तक है कि जिन 133 शिक्षकों को फर्जी बताया जा रहा है, उनके प्रमाण पत्रों का सत्यापन भी बड़ी तीव्र गति से हुआ। तैनाती के एक से डेढ़ माह बाद उनका वेतन भी निर्गत होने लगा। इसी का नतीजा है कि बांसी डायट में 2010 में आग लगने की घटना का अब तक खुलासा नहीं हो सका।फिलहाल वीरेंद्र, दयाशंकर, अजय, पूजा, सोनी की शिकायत के बाद अब जांच का जिम्मा सीडीओ हर्षिता माथुर को दिया गया है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि अगर जांच सही तरीके से हो जाएं तो 150 से अधिक शिक्षक फंसेंगे। साथ ही कई अधिकारियों की गर्दन भी फंसेगी।
2010 में लगी थी डायट में आग, अब नहीं हो सकी जांच
जिले में फर्जी शिक्षकों का मामला कोई नया नहीं है। इससे पूर्व भी 2004 में भी पूनम पांडेय प्रकरण हुआ था। इस नाम की महिला देवरिया व सिद्धार्थनगर जिले में तैनात थी। जांच में इस बात का खुलासा भी हुआ कि सभी डिग्रियां फर्जी पाई गईं। इसके बाद 2010 में फिर फर्जी शिक्षकोंकाम मामला जोर-शोर से उठा। इसके कुछ दिनों बाद ही डायट में आग लग गई। इसमें कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जल गए। मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंपी गई। लेकिन विभागीय सहयोग न मिलने के कारण मामला ठंडा बस्ते में चला गया।
डुमरियागंज व इटवा में सबसे अधिक गोलमाल
विभागीय सूत्रों की माने तो जिन 133 शिक्षकों की डिग्री संदेह के घेरे में है। उनमें सबसे अधिक शिक्षक डुमरियागंज व इटवा तहसील में तैनात हैं। इनमें से कई शिक्षकों को पूर्व में नोटिस भी मिल चुका है। लेकिन इसके बाद मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। यही वजह है कि एक फर्जी शिक्षक के भुगतान पर रोक लगाने के बाद फिर से भुगतान की प्रक्रिया शुरू कर दी गई।