ओपीडी में दलाल : डाॅक्टर लिख रहे बाहर की दवा, मरीज है बेहाल
-मेडिकल कॉलेज में कुछ डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मी ही दे रहे दलालों का साथ
-मरीजों ने दिखाएं निजी अस्पतालों और जांच केंद्रों के कार्ड
राहुल त्रिपाठी
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज दलालों के चंगुल में फंस चुका है। स्टाफ के साथ उनका गठजोड़ मरीज और तीमारदारों को दवा ही नहीं जांच के लिए भी निजी अस्पताल और पैथोलॉजी की ओर ले जा रहा है। इसमें ओपीडी में बैठे डॉक्टर भी शामिल हैं। पड़ताल में कुछ मरीजों ने दावा किया कि डॉक्टर ने अलग पर्ची पर न सिर्फ बाहर की दवा लिखी बल्कि निजी अस्पतालों और जांच केंद्रों के कार्ड भी दिए। नियम के अनुसार निजी जांच सेंटर का कार्ड नहीं देना चाहिए, लेकिन सरकारी अस्पताल में ही ये धंधा धड़ल्ले से चल रहा है।
मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में बुधवार दोपहर जो दृश्य दिखे वे चौंकाने वाले थे। ओपीडी में पंजीकृत 1283 मरीज और उनके परिजन थे। जैसे ही डॉक्टर को दिखा कर बाहर निकले, वैसे ही निजी अस्पतालों के लिए काम करने वाले मरीज माफिया उनके पीछे लग गए। इनके झांसे में नहीं आए कई मरीजों ने बताया कि ओपीडी में बैठे तीनों डॉक्टरों ने केवल बाहर की दवा लिखी। उनकी ओर से बकायदा निजी पैथोलॉजी और अल्ट्रासाउंड का कार्ड भी थमाया गया। इन मरीजों ने बाहर से लिख दवाओं के पर्चे भी दिखाए। उनके पास से निजी पैथोलॉजी और अल्ट्रासाउंड सेंटर के कार्ड भी मिले। उन्होंने डॉक्टर कहने के अनुसार निजी अल्ट्रासाउंड सेंटर से जांच भी कराई थी।
इतना ही नहीं, ब्लड बैंक में भी खून की खरीद-फरोख्त की बात लोगों ने बताई। पता चला कि एक महिला मरीज को 12 हजार रुपये में खून दिलाया गया है। एक स्वास्थ्य कर्मी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि यहां वीआईपी के नाम पर रुपये लेकर खून दे दिया जाता है।
मुफ्त में चला गया खून
मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक में बुधवार को मात्र 17 यूनिट खून बचा हुआ था। इसमें बी निगेटिव एक, ए पॉजिटिव चार और ओ पॉजिटिव 12 यूनिट थे। सितंबर में जुलाई में 59 यूनिट, अगस्त में 68 यूनिट व सितंबर में अब तक 13 यूनिट खून बिना रक्तदाता के दे दिया गया। ये सब थैलेसीमिया, जेएसवाई और वीआईपी लोगों के नाम किया गया। इधर, रक्तदाताओं की अपेक्षा मुफ्त खून लेने वाले बढ़ गए और ब्लड बैंक में खून का टोटा हो गया।
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मैं सोचकर आई थी कि मेडिकल कॉलेज में अच्छी तरह से इलाज हो जाएगा। मांसपेशियों में दर्द बना रहता है। यहां आए तो डॉक्टर ने बाहर की जांच लिख दी। जांच हुई तो दो हजार रुपये की दवा लिखी। रुपये नहीं है, अब दवा कहां से खरीदूं। बिना दवा खरीदे ही जा रही हूं।
गीता, पिछौरा
मेडिकल कॉलेज में एक रुपये की पर्ची पर जांच व दवा हो जाती है। यही सोचकर 20 किलोमीटर से चलकर इलाज करवाने आई थी। लेकिन, यहां तो सभी प्रकार की जांच को बाहर से लिख दिए हैं। अल्ट्रासाउंड की जांच करवानी थी। पैसा नहीं है, बिना इलाज कराए ही घर जाना पड़ रहा है।
शिमलावती, सिभौली चेतिया
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कान में तकलीफ है तो डॉक्टर को दिखाया। उन्होंने बाहर की जांच लिख दी है। जब मैंने पूछा की अंदर जांच हो जाएगी, रुपये नहीं है तो डॉक्टर ने कहा कि पैसा नहीं है तो एक साल बाद आना। बिना जांच के ही दवा खरीदी हूं।
सहबाज, बरदहवा ठाड़वारिया
स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की ओपीडी में मैंने डॉक्टर को दिखाया। उन्होंने बाहर से अल्ट्रासाउंड जांच कराने को लिखा। पैसा न होने के कारण जांच नहीं हो पाई। जांच नहीं हुई तो डॉक्टर ने दवा भी नहीं लिखा। किराया और दिनभर का समय बर्बाद हुआ।
संगीता, चेतिया
मेडिकल कॉलेज में ओपीडी में डॉक्टर निजी अस्पताल या जांच सेंटर का कार्ड दे रहे हैं, तो गलत है। इस मामले की जांच की जाएगी। मरीजों को भी शिकायत करनी चाहिए, ताकि जांच और दवा बाहर से लिखने वाले डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
डॉ. एके झा, प्रभारी प्राचार्य