सिद्धार्थनगर के रोडवेज डिपो में बदहाल पड़ी बसें।
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सिद्धार्थनगर। बुद्ध भूमि को जिला बने 28 साल हो चुके हैं। बावजूद परिवहन सेवा सुदृढ़ नहीं हो पाई है। बड़े शहरों के लिए बसों का टोटा है। जो बसें जाती हैं, उनकी हालत भी खस्ता है। रोडवेज सेवा डग्गामार बसों के भरोसे है। कई प्रमुख ग्रामीण रूटों पर सरकारी बसें नहीं है। नेपाल सीमा पर होने के बावजूद सरकारी परिवहन सेवा की बदहाल का लाभ प्राइवेट बस संचालक इसका लाभ उठा रहे हैं। परिवहन सेवाओं में सुधार इस चुनाव का बड़ा मुद्दा है।
स्थानीय रोडवेज डिपो के पास कुल 38 बसों का बेड़ा है। चार अनुबंधित बसें संचालित हैं।
अधिकांश सरकारी बसों की हालत बदतर हो चुकी है। वर्षों पुरानी इन बसों की चर्चा आम बोलचाल में खटारा के रूप में होती है। यात्री पहले धक्का देकर इसे चालू करते हैं, फिर उसी में बैठकर सफर करते हैं। बस्ती और गोरखपुर के अलावा रोडवेज डिपो में लंबी दूरी की बसों का टोटा है। एक बस वाराणसी जाती है तो चुनिंदा बसों की मंजिल लखनऊ है। इनका भी कोई समय निर्धारित नहीं है। रात 8 बजे के बाद रोडवेज डिपो पर सन्नाटा छा जाता है इसके बाद यहां से बस नहीं जाती है। देश-दुनिया के पर्यटक यहां आना चाहते हैं, लेकिन परिवहन सेवा की अव्यवस्था से परेशानी होती है। विकास के लिए परिवहन सेवा का विस्तार अहम है, लेकिन जिले के जनप्रतिनिधियों के लिए यह कभी मुद्दा नहीं रहा। नतीजा लोग खटारा हो चुकी बसों में सफर करें या फिर जान जोखिम में डालकर प्राइवेट बसों में यात्रा करें।