सिद्धार्थनगर। ब्रिटिश हुकूमत में शोहरतगढ़ के बुधई राम बगीचे में बच्चों को पढ़ाते थे। वे चाहते थे कि अगली पीढ़ी शिक्षित होगी तो भविष्य में अंग्रेजों को भगाने का रास्ता आसान हो जाएगा। अंग्रेज अफसरों को लगा कि बुधई राम लोगों को सरकार के खिलाफ भड़का रहे हैं। अंग्रेजों की यातना से बुधईराम और परमेश्वर दत्त शहीद हो गए थे।
चौरीचौरा जन विद्रोह के बाद अंग्रेजों का दमन चक्र चला तो शोहरतगढ़ भी इससे अछूता नहीं रहा। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आंदोलन को धारदार बनाने में जुटे, तो ब्रिटिश हुकूमत उन पर कोड़े बरसाने लगी। आजादी के आंदोलन में कई बार जेल जा चुके दो दोस्त बुधईराम और परमेश्वर दत्त अंग्रेजों की यातना से शहीद हो गए थे। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु के इतिहास विभाग के प्रोफेसर डॉ. एसएन चौबे ने बताया कि शहादत से पहले बुधई राम ने क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगाई थी।
शोहरतगढ़ में अंग्रेजों की बर्बरता व दमन के बाद महात्मा गांधी ने नवजीवन में लिखा था कि खलीलाबाद के बाद शोहरतगढ़ की जनता शांति से चौरीचौरा कांड का प्रतिकार कर रही थी। सेनानियों की तरफ से हिंसा हुई थी या नहीं, यह पता करने महात्मा गांधी के पुत्र देवास गांधी शोहरतगढ़ भी आए थे। यहां पुलिस ने उनके साथ भी अभद्रता की थी। इसका उल्लेख मणेंद्र मिश्रा मशाल ने अपनी पुस्तक ''''बस्ती मंडल के आलोक में स्वतंत्रता संग्राम'''' में भी किया है। वहीं, बस्ती गजेटियर में भी दमन का उल्लेख है।
जंग-ए-आजादी की पहली मशाल मई 1857 के आखिरी हफ्ते में जल चुकी थी। इस मशाल को जलाए रखने में शोहरतगढ़ भी पीछे नहीं था। 1857 से लेकर 1922 तक ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध आंदोलन किए गए। स्वतंत्रता संग्राम में भारत माता के कई सपूतों ने अपना बलिदान दिया था। चार फरवरी 1922 को चौरीचौरा जनविद्रोह के बाद ब्रिटिश हुकूमत दमन पर उतर आई थी।
अखिल भारतीय कांग्रेस के कार्यालयों और सेनानियों की निगरानी होने लगी थी। 29 अप्रैल 1922 को शोहरतगढ़ कस्बा स्थित कांग्रेस कार्यालय पर सौ-डेढ़ सौ कार्यकर्ता आंदोलन की रूपरेखा बना रहे थे। अंग्रेज अधिकारियों ने पुलिस के साथ छापा मारा और कार्यालय में आग लगा दी। कार्यकर्ताओं पर कोड़े बरसाने लगी। इसमें बुधईराम घोड़ों की टापों के नीचे आकर शहीद हो गए, वहीं शोहरतगढ़ के धमरसिंहवा निवासी परमेश्वर दत्त पांडेय कोड़े खाकर बेहोश हो गए। अंग्रेज उन्हें पकड़ कर लखनऊ जेल ले गए, जहां वे शहीद गए।
बस्ती छावनी में लगाई थी आग
शिवपति स्नातकोत्तर महाविद्यालय में इतिहास की प्रवक्ता डॉ. ज्योति सिंह ने बताया कि चौराचौरी जन विद्रोह के बाद अंग्रेज दमन पर उतर गए थे, लेकिन सेनानियों के कदम नहीं डिगे। कोटिया निवासी कोतवाल सिंह, छतहरा निवासी शीतल प्रसाद त्रिपाठी, अगया निवासी कोदई प्रसाद मिश्र, इमिलिया शुमाली निवासी पं. बेनी माधव मिश्रा, खैरा निवासी महादेव चौधरी ने नए सिरे से कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी की। कोतवाल सिंह की अगुवाई में बस्ती छावनी में आग लगाकर तिरंगा फहराया गया था। इससे बौखलाए अंग्रेजों ने पं. बेनी माधव मिश्रा का घर जला दिया था।