-भाजपा की रणनीति रही कामयाब, ब्रह्मण वोटरों को साधने में विफल रही सपा
-दूसरे दलों के नेताओं ने भाजपा का दामन थाम कर, जीत की राह की आसान
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। बस्ती मंडल की तीन सीटों में से केवल डुमरियागंज की सीट को ही बचाने में भाजपा कामयाब रही। मंडल की दो अन्य सीटों बस्ती व संतकबीरनगर पर सपा ने जातीय समीकरण साधते जीत दर्ज की। वहीं डुमरियागंज में सपा की जातीय समीकरण साधने की रणनीति कामयाब नहीं हो सकी। यहां बेस वोटरों के साथ ब्राह्मण मतों को साथ लाने के लिए सपा से चुनाव में उतरे भीष्मशंकर उर्फ कुशल तिवारी को हार का सामना करना पड़ा और भाजपा ने जीत हासिल की। पिछले चुनाव में मंडल तीनों सीटों पर भाजपा ने शानदार जीत दर्ज करते हुए कब्जा जमाया था।
लगभग 25 फीसदी मुस्लिम आबादी वाली डुमरियागंज सीट पर इस बार जीत का सिलसिला कायम रखना भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती थी। इस सीट पर जीत की हैट्रिक लगा चुके भाजपा प्रत्याशी जगदंबिका पाल को चौथी जीत हासिल करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देना पड़ा। भाजपा की चुनावी गणित उस समय और उलझ गई, जब गठबंधन की ओर से सपा प्रत्याशी के रूप में भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी के नाम की घोषणा कर दी गई। लगभग 13 फीसदी ब्रह्मण वोटरों वाली लोकसभा में बड़े ब्रह्मण चेहरे के चुनावी मैदान में उतरने से सियासी तापमान सातवें आसमान पर पहुंच गया। मुस्लिम, यादव के अपने परंपरागत वोट बैंक के साथ ब्राह्मण मतों को अपने पाले में लाकर सपा, चुनावी गणित बैठाने में जुट गई। बसपा की ओर से कमजोर प्रत्याशी के मैदान में होने से सपा संविधान बचाने की बात कहकर दलित वोटरों को भी साधने लग गई। मजबूत जातीय समीकरण और घेराबंदी को तोड़कर जीत का सिलसिला कायम रखना इस बार भाजपा प्रत्याशी के लिए आसान नहीं नजर आ रहा था।
राजनीति के मंझे खिलाड़ी माने जाने वाले जगदंबिका पाल अपने राजनीतिक कौशल से घेराबंदी को तोड़ने की मुहिम में बड़ी ही सूझ बूझ से लग गए। मोदी-योगी के काम के सहारे जनता के बीच जाने के साथ रूठे साथियों और अन्य दलों के नेताओं को अपने साथ जोड़ने में कामयाब रहे। कभी भाजपा के साथ रहे और विधानसभा चुनाव लड़ चुके नेता हरिशंकर सिंह, राजू श्रीवास्तव की घर वापसी कराई। इसके अलावा सपा नेता रामकुमार उर्फ चिंकू यादव, कांग्रेस के सच्चिदानंद पांडेय, बसपा के अशोक त्रिपाठी और पिछले चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ चुके डॉ. चंद्रेश उपाध्याय को भाजपा में शामिल कराने में कामयाब रहे। माना जा रहा है कि इस बार के चुनाव में भाजपा को जहां बसपा की कमजोरी का फायदा मिला और दलित वोटों को भी अपने साथ जोड़ने में कामयाब रही। वहीं सपा के बेस वोटरों में सेंधमारी करने में कामयाब रही भाजपा की इसी चुनावी रणनीति का नतीजा रहा कि वह सपा के जातीय समीकरण को धराशाई करते हुए जीत का परचम लहराने में कामयाब रहे।
आसपा को बसपा से अधिक वोट मिले
सिद्धार्थनगर। डुमरियागंज सीट के परिणाम की घोषणा के बाद एक बात और स्पष्ट हो गई इस बार के चुनाव में बसपा का वोट बैंक काफी हद तक बिखर गया। पिछले चुनाव में जहां सपा-बसपा गठबंधन की ओर से मैदान में उतरे बसपा प्रत्याशी आफताब आलम दूसरे नंबर पर थे वहीं इस बार बसपा अपनी जमानत तक नहीं बचा पाई। बसपा की हालत ऐसी हो गई कि उसके प्रत्याशी मु. नदीम को आजाद समाज पार्टी के प्रत्याशी अमर सिंह चौधरी से भी कम वोट मिला। माना जा रहा है कि बसपा का एक बड़ा वोट बैंक, आजाद समाज पार्टी की ओर शिफ्ट हुआ, साथ ही भाजपा और सपा भी दलित वोटों को अपने पाले में लाने में कुछ हद तक सफल रही।