- निजी बसों में सहूलियत भरे सफर के बीच चालक की झपकी जानलेवा
- लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे पर हुए हादसे में स्लीपर बस में सवार सात लोगों की गई जान
- ट्रेनों में लंबी वेटिंग और खस्ताहाल रोडवेज बसों की वजह से निजी बसों का रुख कर रहे लोग
सिद्धार्थनगर। ट्रेनों के रिजर्वेशन में लंबी वेटिंग और खस्ताहाल रोडवेज बसों के बीच आपात सफर के लिए आसानी से उपलब्ध लग्जरी बसें लुभाती हैं। भीषण गर्मी में एसी समेत अन्य सहूलियतों वाली इन बसों की स्टीयरिंग थामे चालक नींद से लड़ रहे होते हैं और यात्रियों की जिंदगी दांव पर होती है। हाईवे पर आए दिन हो रहे हादसे इसकी तस्दीक कर रहे हैं। सोमवार को लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे पर हुए हादसे में स्लीपर बस में सवार सात लोग जान गंवा बैठे। इनमें बस्ती के भी दो लोग शामिल रहे।
सड़क सुरक्षा के जानकार कहते हैं कि रात के दो बजे हाईवे पर तेज रफ्तार में दौड़ती स्लीपर बसों के लिए सबसे बड़ा खतरा है अक्सर उसका चालक ही होता है जो घंटों से स्टीयरिंग संभाले बैठा होता है। लंबी दूरी की कई निजी स्लीपर बसों में खर्च बचाने के लिए सीमित चालक रखे जाते हैं। कई रूटों पर एक ही चालक घंटों लगातार बस चलाता है, नतीजा यह होता है कि वह उनींदी आखों में ही बस दौड़ाता रहता है। डुमरियागंज, इटवा, बांसी, नौगढ़ आदि कई जगह से डबल डेकर स्लीपर बसें लखनऊ, दिल्ली, मुंबई, गुजरात से लेकर देश के तमाम बड़े शहरों के सफर पर रवाना होती हैं।
ड्राइवरों का कहना है कि देर होने पर अगली ट्रिप प्रभावित होती है। बस देर से पहुंचेगी तो सफाई, लोडिंग और अगला प्रस्थान भी पीछे खिसक जाएगा। यही वजह है कि सबसे ज्यादा खतरा रात के दो बजे से सुबह पांच बजे तक होता है। एक चालक ने नाम न छापने का अनुरोध करते हुए बताया कि रात में अगर कहीं ज्यादा देर रुक गए तो लगातार फोन आने लगते हैं। कई बार नींद लगती है लेकिन बस रोकना मुमकिन नहीं होता। सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ बताते हैं कि हाईवे पर चालक की तीन से पांच सेकंड की झपकी भी बस के बेकाबू हो जाने के लिए काफी होती है।
सफर की आपाधापी में सुरक्षा की अनदेखी
ट्रेवेल्स के कारोबार से जुड़े जानकार बताते हैं कि चालकों पर सिर्फ वाहन चलाने का दबाव नहीं होता। समय पर पहुंचना, यात्रियों की शिकायत, मालिक के फोन, ट्रैफिक और रातभर जागते रहने की वजह से तनाव भी लगातार बना रहता है। चिकित्सक डॉ. रामजी सोनी बताते हैं कि थकान सिर्फ शरीर नहीं बल्कि फैसले लेने की क्षमता को भी प्रभावित करती है। रात के लंबे सफर में कई चालक खुद को जगाए रखने के लिए लगातार चाय, तंबाकू या एनर्जी ड्रिंक का सहारा लेते हैं। हाईवे के ढाबों पर रात तीन बजे चेहरे पर पानी के छींटे मारते और चाय पीते दिखते हैं।
समय की होड़ ने बढ़ाई स्पीड
पुराने बस ऑपरेटर बताते हैं कि निजी स्लीपर बसों के कारोबार में समय सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धा बन चुका है। कौन सी बस पहले पहुंचेगी, कौन सी कम समय लेगी और कौन ज्यादा ट्रिप कर पाएगी, इसी होड़ में कई बार स्पीड सुरक्षा पर भारी पड़ जाती है। यात्रियों को आकर्षित करने के लिए फास्ट सर्विस और कम समय जैसे दावे किए जाते हैं, लेकिन सड़क पर चालक पर इसका दबाव पड़ता है। कई चालकों के मुताबिक रास्ते में अनावश्यक रुकने से बचने और समय कवर करने के लिए लगातार तेज गति बनाए रखने का दबाव रहता है।
इंच-इंच जगह से कमाई, सुरक्षा सबसे पीछे
स्लीपर बसों का पूरा मॉडल अधिक कमाई पर टिका है। ज्यादा सीट, ज्यादा टिकट और साथ में पार्सल लोडिंग। कई बसों में लगेज बॉक्स सामान से भरे रहते हैं। जानकार बताते हैं कि कई बार ज्वलनशील सामग्री तक लोड कर दी जाती है। हादसे की स्थिति में यही सामान आग फैलाने का कारण बनते हैं लेकिन प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ चुकी है कि कई ऑपरेटर लागत कम करने और अधिक कमाई के लालच में सुरक्षा को प्राथमिकता देना भूल जाते हैं।
नियम हैं लेकिन निगरानी कम
स्लीपर बसों के लिए इमरजेंसी एग्जिट, फायर सिस्टम, फिटनेस जांच, स्पीड गवर्नर और चालक की ड्यूटी के तय घंटों के नियम हैं, लेकिन सवाल इन नियमों के पालन का है। हालांकि, सड़क सुरक्षा से जुड़े विशेषज्ञ मानते हैं कि रात में चलने वाली बसों की निगरानी सबसे बड़ी चुनौती है। चालक कितने घंटे से वाहन चला रहा है, रास्ते में कितनी बार बदला गया और बस के अंदर सुरक्षा व्यवस्था वास्तव में काम कर रही है या नहीं, इन सवालों की नियमित निगरानी बेहद सीमित दिखाई देती है।
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बड़े हादसों में ये बातें कॉमन
- देर रात या तड़के का समय
- चालक की थकान या झपकी
- तेज रफ्तार
- डिवाइडर/खड़े वाहन से टक्कर
- आग या शॉर्ट सर्किट
- यात्रियों का अंदर फंस जाना
स्लीपर बसों के लिए तय नियम
- लंबी दूरी पर चालक बदलाव की व्यवस्था
- स्पीड गवर्नर अनिवार्य
- इमरजेंसी एग्जिट कार्यशील होना जरूरी
- फायर एक्सटिंग्विशर और हथौड़े अनिवार्य
- फिटनेस और परमिट वैध होना चाहिए
- खतरनाक सामान लोडिंग प्रतिबंधित
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स्लीपर बस में सफर...यात्री ध्यान रखें
- बस में चढ़ते ही इमरजेंसी एग्जिट जरूर देख लें
- फायर एक्सटिंग्विशर और इमरजेंसी हथौड़े की स्थिति जांच लें
- चालक बेहद थका या असामान्य लगे तो सतर्क रहें
- जरूरत से ज्यादा ओवरस्पीड महसूस हो तो विरोध दर्ज कराएं
- गलियारे और एग्जिट के पास सामान न रखें
- रात में सीट बेल्ट उपलब्ध हो तो इस्तेमाल करें
- बस नंबर और लोकेशन परिवार के साथ साझा रखें
- अधिकृत और पंजीकृत ऑपरेटर की बस को प्राथमिकता दें
ट्रांसपोर्टर की अलग कहानी
प्राइवेट बस ऑपरेटरों का कहना है कि बढ़ती प्रतिस्पर्धा और यात्रियों की अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं रह गया है। बस संचालक आमिर ने कहा कि यात्री अब कम समय में आरामदायक सफर चाहते हैं। किराया थोड़ा बढ़ते ही लोग दूसरी बस चुन लेते हैं। ऐसे में ऑपरेटरों पर समय और लागत दोनों का दबाव रहता है। ट्रांसपोर्टर अनिल सिंह का कहना है कि ज्यादातर बस ऑपरेटर नियमों का पालन करते हैं लेकिन कुछ मामलों की लापरवाही पूरे सेक्टर की छवि खराब कर देती है।
स्लीपर बसों की नियमित फिटनेस जांच और कार्रवाई के लिए अभियान चलाए जाते हैं। सुरक्षा मानकों का पालन न करने पर कार्रवाई भी की जाती है।
- संजय सिंह, एआरटीओ