सिद्धार्थनगर। गैर बासमती चावल के निर्यात पर प्रतिबंध से सिद्धार्थनगर में एक जिला एक उत्पाद के रूप में चयनित कालानमक चावल के बाजार को बड़ा झटका लगा है। ओडीओपी के तहत चयन के बाद जिले में कालानमक धान की खेती का रकबा पांच हजार से बढ़कर 15 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गया है, लेकिन निर्यात पर रोक से किसान से लेकर इसके व्यापार तक से जुड़े लोगों की परेशानी बढ़ गई है। खासतौर से नेपाल में कालानमक चावल की मांग काफी अधिक थी। छोटे निर्यातकों को इसका खास लाभ होता था। अव वे कारोबार बंद होने की आशंका से परेशान हैं। दूसरी ओर, निर्यात पर रोक से जिले में कालानमक चावल के दाम में कमी आएगी, जिसका लाभ आम लोगों को होगा। उन्हें सस्ते दर पर कालानमक चावल का स्वाद चखने का मौका मिलेगा।
केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय में महंगाई पर नियंत्रण के लिए चावल के निर्यात पर रोक लगाई है, लेकिन इसमें गैर बासमती चावल के रूप में कालानमक चावल भी निर्यात के दायरे से बाहर हो गया है। वर्ष 2018 में कालानमक चावल को ओडीओपी योजना में शामिल गिया, उसके बाद ब्रांडिंग मार्केटिंग करके कालानमक के स्वाद और सुगंध काे देश-विदेश के लोगों में पहुंचाया गया है। कालानमक धान की खेती का रकबा पांच हजार हेक्टेयर से बढ़कर 15 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गया। निर्यात और अन्य राज्यों में नए बाजार बने तो कालानमक चावल की कीमत 60-70 रुपये से बढ़कर 100 से 110 रुपये हो गई, लेकिन निर्यात बंद हुआ तो भाव गिरने की पूरी आशंका है।
इतना हुआ था निर्यात
एक अनुमान के मुताबिक कालानमक धान का उत्पादन करीब तीस हजार टन है। पिछले साल नेपाल के काठमांडू, सिंगापुर 55 टन, दुबई एक टन एवं जर्मनी में एक टन कालानमक चावल निर्यात हुआ है। कुछ दिन पहले दस टन चावल सिंगापुर भेजा गया है। 2019-20 में 2 प्रतिशत, 2020-21 में 4 प्रतिशत और 2021-22 में सात प्रतिशत निर्यात हो गया। विशेषज्ञों के अनुसार घरेलू बाजार में उपभोक्ताओं को अधिक महंगा चावल न मिले, इस कारण निर्यात पर रोक लगाई गई है।
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कृषि वैज्ञानिक ने लिखा पत्र
कृषि वैज्ञानिक डॉ. आरसी चौधरी ने बताया कि बासमती की तरह कालानमक चावल का भी निर्यात शुरू करने के लिए केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय को पत्र लिखा है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उप्र, हिमाचल, उत्तराखंड एवं जम्मू कश्मीर छह राज्यों के प्रोत्साहन के लिए बासमती एक्सपोर्ट प्रमोशन बोर्ड बनाया गया है। बासमती के निर्यात के लिए कोड मिला है, इस चावल पर निर्यात शुल्क भी नहीं लगता था। पहले कालानमक चावल के निर्यात शुल्क देना पड़ा, जबकि अब निर्यात ही बंद हो गया। जिले में कालानमक निर्यातक बोर्ड के गठन की प्रक्रिया जारी है, लेकिन भौगोलिक सूचकांक के अनुसार कालानमक के लिए बेहतर पाए गए गोरखपुर, बस्ती व देवीपाटन के जिलों को जोड़ते हुए बोर्ड बनाया जाएगा तो सफलता मिलेगी। इसके किसान, निर्यातक, व्यापारी एवं राइस मिलर के साथ बैठक करने के लिए जिलाधिकारी को पत्र भेजा हूं।
बासमती से बेहतर है कालानमक चावल
कृषि वैज्ञानिक डॉ. आरसी चौधरी ने बताया कि बासमती और कालानमक दोनों सुगंधित चावल है, लेकिन शोध के तथ्यों के अनुसार कालानमक ज्यादा बेहतर है। बासमती की अपेक्षा कालानमक में दोगुना प्रोटीन 11 प्रतिशत, तीन गुना आयरन 0.30 मिग्रा प्रति 100 ग्राम, चार गुना जश्ता 0.40 मिग्रा प्रति 100 ग्राम होता है। कालानमक चावल शुगर फ्री है। जिस चावल में 55 प्रतिशत कम ग्लाइसमिक इंडेक्स होता है, वह शुगर फ्री होता है। कालानमक चावल में 49 से 52 प्रतिशत ग्लाइसमिक इंडक्स है, जबकि बासमती में 85 प्रतिशत होता है। कालानमक इकलौता चावल है जिसमें विटामिन ए पाया जाता है।
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किसानों का दर्द
कालानमक सदियों से विशेष चावल है, लेकिन इसे सामान्य चावल के दायरे में ही रखा गया है। निर्यात बंद होने से सबसे अधिक नुकसान सिद्धार्थनगर का होगा। बासमती की तरह कालानमक को भी विशेष चावल का दर्जा मिलना चाहिए।
-मुरलीधर मिश्र, किसान, पलिया निधि
जिले में कालानमक की खेती का रकबा तीन गुना बढ़ गया है। अब तो नेपाल में भी कालानमक चावल की बिक्री नहीं होगी। महंगाई बढ़ गई है, कालानमक चावल का निर्यात शुरू नहीं हुआ तो किसानों का बड़ा नुकसान होगा।
-नसीम अहमद, किसान, बर्डपुर
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बासमती की तर्ज पर कालानमक चावल का निर्यात करने की सुविधा के लिए पत्राचार किया जाएगा। कालानमक निर्यातक बोर्ड के गठन के संबंध में बैठक होगी, उसके बाद पत्राचार किया जाएगा।
-दयाशंकर सरोज, उपायुक्त उद्योग