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अल्लाह के प्रति समर्पण का पर्व है बकरीद

Mon, 12 Sep 2016 10:45 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
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बांसी ईदगाह का निरीक्षण करते एसडीएम। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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बांसी। अल्लाह के प्रति समर्पण का पर्व है ईद-उल -अजहा। यह पर्व मुसलमानों को अहसास दिलाता है कि हमें दीन की सरबुलंदी के लिए जान, माल, घर, परिवार की कुर्बानी देनी पड़े तो क्षण भर की देरी नहीं करनी चाहिए। 
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करीब 14 सौ वर्ष पहले सऊदी अरब के मीना की पहाडिय़ों मे हजरत इब्राहिम ने अपने इकलौते बेटे हजरत इस्माइल की कुर्बानी करना चाहा था। तभी से पूरी दुनिया के मुसलमान आज के दिन हलाल जानवरों की कुर्बानी कर इस सुन्नत को अदा करते हैं। मदरसा अनवारूल उलूम के सदर मुदर्रिस कारी सैयद अब्दुल ताहिर कहते हैं कि इस्लाम को मानने वालों के लिए दो पर्व ईद-उल-फितर व ईद-उल-अजहा बहुत ही महत्वपूर्ण है।
इस्लाम के पैगंबर हजरत इब्राहिम ने अल्लाह से दुआ किया कि उन्हें एक नेक बेटा दे जो दीन को आगे बढ़ाए और उनके बुढ़ापे का सहारा बने। अल्लाह ने उनकी दुआ को  कबूल किया। उनके घर एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम इस्माइल रखा गया। हजरत इस्माइल जब बड़े हुए तो हजरत इब्राहिम ने एक सपना देखा कि वह अल्लाह की राह में अपने चहेते बेटे को कुर्बान कर रहे हैं। सुबह जब उन्होंने सपने के बारे में बेटे को बताया तो हजरत इस्माइल ने अपने पिता से कहा कि आप अल्लाह के हुक्म का पालन करे।
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इसके बाद हजरत इब्राहिम अपने बेटे इस्माइल को लेकर मीना की वादियों मे पहुंचे और आंख में पट्टी बांधकर बेटे की गर्दन पर छूरी चला दिया। हजरत इब्राहिम व हजरत इस्माइल की आत्मीयता अल्लाह को पसंद आई। अल्लाह के फरिश्तों ने हजरत इस्माइल को हटा कर उनके स्थान पर दुम्बा भेड़ को रख दिया। तभी से दुनिया भर के मुसलमान हर वषज् आज के दीन हलाल जानवरों की कुर्बानी कर इस सुन्नत को अदा करते हैं।
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