सिद्धार्थनगर। तथागत बुद्ध की धरती पर प्राचीन अवशेषों के साक्ष्यों को प्रमाणित नहीं होने के कारण यहां अपेक्षित विकास नहीं हो पा रहा है। संरक्षण नहीं होने के कारण प्राचीन स्तूपों व टीलों का क्षरण हो रहा है, जबकि मानवीय एवं पशुओं के हस्तक्षेप के कारण भी प्राचीन टीलों का अस्तित्व खतरे में हैं, जबकि प्राचीन अवशेषों की बदौलत यहां भी पर नेपाल के लुंबिनी की तर्ज पर विकास की राह आसान हो सकती है।
इतिहासकारों के अनुसार कपिलवस्तु स्तूप उन आठ मौलिक स्तूपों में से एक हैं, जो गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अवशेषों पर बनाए गए थे, इसके आसपास भी कई पुरातात्विक धरोहर हैं।
पीएमओ से आए एक मेल के बाद एक साल पहले जिले के गांवों में पुरातात्विक सर्वें का आदेश हुआ था, लेकिन एक साल बाद भी केंद्रीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण विभाग ने सर्वेक्षण के लाइसेंस की प्रक्रिया पूरी नहीं की है, जबकि इस एक साल के दौरान भी प्राचीन टीलों का क्षरण हुआ है। इस मामले में अधीक्षण पुरातत्वविद आफताब हुसैन से बात करने की कोशिश की, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका। उनका पक्ष प्राप्त होने पर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
अवैध खनन रोकना आवश्यक
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु के प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नीता यादव ने बताया कि प्राचीन टीलों पर अवैध खनन को रोकना बहुत आवश्यक है। विश्वविद्यालय के कुछ दूर स्थित लाला पंचगवां में प्राचीन टीले पर हो रहे अवैध खनन के बाद उन्होंने ऐप के माध्यम से पीएमओ को मेल किया था, उसके बाद सर्वेक्षण का आदेश हुआ, लेकिन यह कार्य शायद शुरू नहीं हुआ है। इन क्षेत्रों में शोध हो तो विकास की राह आसान हो जाएगी।
प्राचीन टीलों का हो रहा क्षरण
कपिलवस्तु क्षेत्र में स्तूप, विहार व अन्य पुरावशेष है। इनमें कहीं स्तूपों में पशु चर रहे हैं तो कहीं जेसीबी से अवैध खनन होता है। गरगजवा टीले में अवैध खनन के बाद एसडीएम डॉ ललित कुमार मिश्र ने पुलिस व राजस्व विभाग को सुरक्षा करने के निर्देश दिए थे। संवाददाता ने बृहस्पतिवार को विषय विशेषज्ञ के साथ प्राचीन टीलों का भ्रमण कर स्थिति देखी।
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु के प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शरदेंदु त्रिपाठी बताते हैं कि गनवरिया में बुद़धकालीन अवासीय संरचनाएं, कुषाण कालीन विभिन्न स्तूप, संघाराम व विहार है। यहां दीवारों में लगी ईट आपस में अलग हो गई है, जबकि ईटों में क्षरण हो रहा है। पिपरीकोट में बाउंड्री है, वहां पशु चरते दिख रहे हैं। पिपरसन व पंचगवां के टीले में क्षरण हो रहा है। गरगजवा में सर्वेक्षण हुआ था,लेकिन वहां और भी महत्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त हो सकते हैं। सालारगढ़ में अस्तबल होने की बात कहीं जाती है, यहां विहार भी है। इसकी प्राचीनता के साक्ष्य प्रमाणित करने की आवश्यकता है। यहां ईंटों का क्षरण हो रहा है।